India Girl Birth Rate Improves : देश में बेटियों के जन्म अनुपात में सुधार के संकेत मिले हैं। एक रिसर्च के मुताबिक, 2015-16 में जहां हर 1,000 लड़कों पर 919 लड़कियों का जन्म दर्ज किया गया था, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर 930 हो गया है। हालांकि, सुधार के बावजूद देश के कई हिस्सों में जन्म के समय लैंगिक अंतर बना हुआ है। इसके अलावा, लड़कियों की उच्च शिक्षा तक पहुंच में भी चुनौतियां सामने आ रही हैं।

Written by Kajal Panchal • Published on : 10 October 2026
IBN24 NEWS NETWORK : ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान से जुड़े शुरुआती जिलों में हुए बदलावों पर आधारित रिसर्च में पाया गया कि जन्म के समय लिंग अनुपात में सुधार हुआ है। अध्ययन के अनुसार, अभियान के प्रभाव का सबसे ज्यादा असर उन परिवारों में देखने को मिला, जिनकी पहली संतान बेटी थी।
पहली संतान बेटी होने पर दूसरी बेटी के जन्म की संभावना बढ़ी
‘Policy Interventions and the Sex Ratio at Birth : Evidence from India’ नामक रिपोर्ट के मुताबिक, दूसरी और उसके बाद की संतानों में लड़की के जन्म की संभावना में 2.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। वहीं, जिन परिवारों की पहली संतान बेटी थी, उनमें दूसरी संतान भी बेटी होने की संभावना 3.7 से 5.3 प्रतिशत अंक तक बढ़ी।

रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे परिवारों में हर 1,000 जन्म पर 37 से 53 अतिरिक्त लड़कियों के जन्म का अनुमान सामने आया। इसके विपरीत, जिन परिवारों की पहली संतान बेटा थी, उनमें ऐसा बदलाव नहीं मिला। इससे संकेत मिलता है कि सामाजिक जागरूकता और सरकारी पहल परिवारों की सोच बदलने में भूमिका निभा सकती हैं।
26 जिलों में लड़कों से ज्यादा लड़कियों का जन्म
देश के 757 जिलों के आंकड़ों के विश्लेषण में 26 जिलों में जन्म के समय प्रति 1,000 लड़कों पर 1,000 से अधिक लड़कियां दर्ज की गईं। वहीं, 243 जिलों में यह अनुपात 950 से 1,000 के बीच रहा।

इन जिलों में रुद्रप्रयाग, कपूरथला, बारामूला, पुलवामा, उत्तरी गोवा, जैसलमेर और उडुपी जैसे जिले शामिल हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में भी जन्म अनुपात में सुधार दर्ज किया गया है। हालांकि, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों के कुछ आंकड़े अलग-अलग रुझान दिखाते हैं। इससे स्पष्ट है कि देश में सुधार समान रूप से नहीं हुआ है। कई क्षेत्रों में बेटियों के जन्म को लेकर सकारात्मक बदलाव दिख रहे हैं, लेकिन लैंगिक समानता का लक्ष्य हासिल करने के लिए अभी और प्रयास करने की जरूरत है।
शिक्षा के मामले में अब भी पीछे हैं लड़कियां
जन्म अनुपात में सुधार के बावजूद लड़कियों की शिक्षा को लेकर चुनौतियां बनी हुई हैं। यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण भारत में उच्च माध्यमिक स्तर यानी 11वीं और 12वीं की पढ़ाई पूरी करने वाले हर 100 लड़कों के मुकाबले केवल 59 लड़कियां यह स्तर पूरा कर पाती हैं।
वहीं, एक अन्य तुलनात्मक आंकड़े के अनुसार, भारत में उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के मामले में हर 100 लड़कों के मुकाबले 89 लड़कियां इस स्तर तक पहुंच पाती हैं। ये आंकड़े अलग-अलग संदर्भों और मापदंडों पर आधारित हो सकते हैं, इसलिए इनकी सीधे तुलना करते समय सावधानी जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, लड़कियों की शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने के लिए जागरूकता अभियान, आर्थिक सहायता, सुरक्षित परिवहन और स्कूलों में बेहतर सुविधाओं पर ध्यान देना जरूरी है। इसके साथ ही, परिवारों में बेटियों की शिक्षा को प्राथमिकता देने की सोच विकसित करना भी महत्वपूर्ण है।
जागरूकता अभियानों से बदलाव की उम्मीद
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों का उद्देश्य बेटियों के जन्म को प्रोत्साहित करना, लिंग आधारित भेदभाव कम करना और लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देना है। रिसर्च में सामने आए सकारात्मक संकेत बताते हैं कि सही नीतियों और सामाजिक जागरूकता से बदलाव संभव है।
हालांकि, जन्म अनुपात में सुधार को स्थायी बनाने के लिए सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और सामाजिक भागीदारी की जरूरत बनी हुई है। साथ ही, लड़कियों को माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के समान अवसर देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कुल मिलाकर, देश में बेटियों के जन्म अनुपात में सुधार उत्साहजनक संकेत है, लेकिन असली सफलता तब होगी जब जन्म से लेकर शिक्षा और रोजगार तक लड़कियों को समान अवसर मिलेंगे।
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