Supreme Court Orders IOC ₹12 Lakh Payout : हरियाणा की एक महिला को करीब 38 साल पहले सिर्फ महिला होने के आधार पर नौकरी से वंचित किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) को महिला सुमित्रा को 12 लाख रुपए का मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि केवल महिला होने के आधार पर किसी को नौकरी से इनकार करना महिला की गरिमा और नारीत्व का अपमान है।

Written by Kajal Panchal • Published on : 18 September 2026
IBN24 NEWS NETWORK : यह मामला साल 1988 का है। उस समय हरियाणा की रहने वाली सुमित्रा का नाम उन 49 लोगों की सूची में शामिल था, जिनकी सिफारिश डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली समिति ने इंडियन ऑयल के LPG बॉटलिंग प्लांट में नौकरी के लिए की थी। सुमित्रा ने खलासी, चपरासी या रीफिलिंग हेल्पर जैसे पदों के लिए इंटरव्यू दिया था। हालांकि, चयन प्रक्रिया के बाद अन्य उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र दे दिए गए, लेकिन सुमित्रा को नौकरी नहीं दी गई। उनके मामले में यह बात सामने आई कि महिला होने और LPG सिलेंडर उठाने में सक्षम नहीं होने की धारणा के कारण उन्हें नियुक्ति नहीं दी गई।
इंटरव्यू देने के बावजूद नहीं मिली नौकरी
सुमित्रा हरियाणा के गुढ़ा गांव की रहने वाली हैं। वर्ष 1988 में LPG बॉटलिंग प्लांट में विभिन्न पदों पर नियुक्ति के लिए उम्मीदवारों का चयन किया जा रहा था। सुमित्रा भी चयनित उम्मीदवारों की सूची में शामिल थीं और उन्होंने संबंधित पदों के लिए इंटरव्यू दिया था।

इसके बावजूद उन्हें नियुक्ति पत्र नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने नौकरी से वंचित किए जाने के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू की और ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। ट्रायल कोर्ट ने माना कि सुमित्रा नौकरी के लिए निर्धारित योग्यता पूरी करती थीं। अदालत ने एक गवाह के बयान का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार महिला को केवल इसलिए नौकरी नहीं दी गई क्योंकि वह महिला थीं।
1993 में बदला ट्रायल कोर्ट का फैसला
ट्रायल कोर्ट के फैसले के बाद इंडियन ऑयल की ओर से अपील की गई। इसके बाद 6 अगस्त 1993 को प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया।
मामला आगे हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा। अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के उस फैसले को पलट दिया था, जिसमें इंडियन ऑयल को सुमित्रा को मजदूर के अलावा किसी अन्य पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद सुमित्रा ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
‘क्या महिलाएं घरों में गैस सिलेंडर नहीं उठातीं ?’
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान इंडियन ऑयल की ओर से दलील दी गई कि संबंधित काम में भारी LPG सिलेंडर उठाने पड़ते हैं। साथ ही रात की शिफ्ट में भी काम करना पड़ता है। इसी आधार पर अधिकारियों की ओर से महिला को इस काम के लिए उपयुक्त नहीं माना गया होगा।

इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि क्या महिलाएं अपने घरों में गैस सिलेंडर नहीं उठाती हैं? कोर्ट ने इस मामले में महिला के साथ हुए व्यवहार को लेकर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि भारत में महिलाओं के सम्मान और गरिमा की बात की जाती है। ऐसे में भारत सरकार की एक कंपनी द्वारा केवल महिला होने के आधार पर नौकरी से इनकार करना महिला की गरिमा का अपमान है।
38 साल बाद नौकरी की जगह मिलेगा मुआवजा
सुमित्रा की ओर से यह मामला लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया में चलता रहा। अब वह रिटायरमेंट की उम्र तक पहुंच चुकी हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अब नौकरी देने के बजाय 12 लाख रुपए का मुआवजा देने का आदेश दिया है।
यह मामला लंबे समय तक चली कानूनी लड़ाई और रोजगार में लैंगिक आधार पर भेदभाव के सवाल से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में महिला की गरिमा और समान अवसर के महत्व पर जोर दिया गया है।
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