CEC Resignation Demand : चुनाव आयोग में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और वोटर लिस्ट से जुड़े फैसलों को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। CJP फाउंडर अभिजीत दीपके ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में ज्ञानेश कुमार से 48 घंटे के भीतर इस्तीफा देने की मांग की। पार्टी ने कहा कि मांग पूरी नहीं होने पर देशभर में आंदोलन किया जाएगा।

Written by Kajal Panchal • Published on : 24 September 2026
IBN24 NEWS NETWORK : यह मांग ऐसे समय सामने आई है, जब 23 सितंबर को प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्ति दर्ज की। इन आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण, वोटर नाम जोड़ने-हटाने, वोटर डेटाबेस की पहुंच और SIR से जुड़े मामलों से था।
CJP ने क्या मांगें रखीं ?
अभिजीत दीपके ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। CJP की ओर से कहा गया कि अगर 48 घंटे में इस्तीफा नहीं दिया गया तो आंदोलन को देशभर में ले जाया जाएगा और इसके बाद दिल्ली में प्रदर्शन किया जाएगा।

दीपके ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR को लेकर गंभीर आरोप भी लगाए। उन्होंने दावा किया कि SIR के जरिए बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। हालांकि, ये आरोप CJP के हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि SIR के दौरान 13 करोड़ से अधिक नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। पार्टी ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया और मतदाताओं के अधिकारों से जोड़ते हुए सवाल उठाए।
चुनाव आयोग में 14 बार आपत्ति का क्या मामला है ?
रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें से चार आपत्तियां 16 अप्रैल को दर्ज की गई थीं।
इन आपत्तियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं। कुछ मामलों में संबंधित उप चुनाव आयुक्तों को भी इसकी जानकारी दी गई थी। इन आपत्तियों में मुख्य तौर पर कई मुद्दे सामने आए।
1. नए वोटरों के Form-6 में बदलाव
रिपोर्ट के अनुसार, नए मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में SIR से संबंधित एक नया सवाल जोड़ा गया था। इसमें आवेदक से उसके या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पिछले SIR की वोटर लिस्ट में होने से जुड़ी जानकारी मांगी गई।
रिपोर्ट के मुताबिक, विवेक जोशी ने इस बदलाव पर सवाल उठाया था और कहा था कि नियमों में बदलाव किए बिना Form-6 में इस तरह का परिवर्तन नहीं किया जा सकता। बाद में सुखबीर सिंह संधू ने भी इस बदलाव को लेकर आपत्ति दर्ज की।
2. वोटर डेटाबेस तक पहुंच का मुद्दा
दोनों चुनाव आयुक्तों ने वोटर डेटाबेस तक पहुंच को लेकर भी सवाल उठाए। रिपोर्ट के अनुसार, विवेक जोशी ने चुनावी डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई और यह सुझाव दिया कि ऑडिट के जरिए यह सुनिश्चित किया जाए कि केवल अधिकृत वैधानिक अधिकारी ही वोटर रिकॉर्ड में बदलाव कर सकें।
सुखबीर सिंह संधू ने भी राज्य स्तर के चुनाव अधिकारियों की ओर से डेटाबेस तक पर्याप्त पहुंच नहीं होने की शिकायतों का उल्लेख किया था।
3. पश्चिम बंगाल में वोटर अपील का मामला
रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान वोटर नामों को लेकर हुई कार्रवाई और उसके बाद दायर अपीलों को लेकर भी सवाल उठे।
रिपोर्ट में बताया गया कि पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए और बाद में कई अपीलें दाखिल हुईं। इनमें हटाए गए मतदाताओं को दोबारा शामिल करने की मांग वाली अपीलें भी शामिल थीं।
4. गोवा में 97 मतदाताओं का मामला
रिपोर्ट में गोवा का एक मामला भी सामने आया। इसके अनुसार, 97 ऐसे मतदाता थे जिन्हें स्थानीय स्तर पर जांच के बाद अंतिम वोटर लिस्ट में शामिल किए जाने योग्य माना गया, लेकिन सॉफ्टवेयर से जुड़ी समस्या के कारण उन्हें दोबारा शामिल करने का विकल्प समय पर उपलब्ध नहीं कराया जा सका।
रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा के अधिकारियों ने इस समस्या को दूर करने के लिए कई बार पत्र लिखे, लेकिन तय समय तक तकनीकी बदलाव नहीं हो सका और ये 97 नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो पाए।
चुनाव आयोग ने क्या कहा ?
इन आरोपों और रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि अलग-अलग विचार और टिप्पणियां किसी भी संस्थान की निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं। आयोग के मुताबिक, अधिकारियों और चुनाव आयुक्तों को सुझाव देने का अधिकार है।

EC ने यह भी कहा कि पिछले एक साल में उसके सभी बड़े फैसले पूरी कमिशन के सर्वसम्मत निर्णयों के आधार पर लिए गए हैं। आयोग के मुताबिक, SIR समेत चुनावी सुधारों और अन्य पहलों से जुड़े फैसले पूरी कमिशन की सहमति से हुए।
इस तरह, एक तरफ रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज आपत्तियों का विवरण सामने आया है, वहीं दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि इन टिप्पणियों को अंतिम फैसलों से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए और आयोग के फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं।
CJP ने किन राजनीतिक घटनाओं पर सवाल उठाए ?
प्रेस कॉन्फ्रेंस में अभिजीत दीपके ने 2024 लोकसभा चुनाव के नतीजों और इसके बाद विभिन्न राज्यों में हुए राजनीतिक घटनाक्रम का भी उल्लेख किया। उन्होंने क्षेत्रीय दलों और नेताओं से जुड़े चुनावी परिणामों को SIR तथा वोटर लिस्ट से जोड़ते हुए सवाल उठाए।

दीपके ने महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और तमिलनाडु सहित कई राज्यों के राजनीतिक घटनाक्रम का उदाहरण देते हुए कहा कि विपक्षी नेताओं और क्षेत्रीय दलों के खिलाफ एक पैटर्न दिखाई देता है। उन्होंने दावा किया कि कुछ प्रमुख नेताओं के निर्वाचन क्षेत्रों में हजारों वोट हटाए गए, जिसके कारण उनके चुनावी परिणाम प्रभावित हुए। हालांकि, इन दावों को CJP के आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए। इनके समर्थन में स्वतंत्र रूप से सत्यापित प्रमाण उपलब्ध होने की पुष्टि नहीं हुई है।
विपक्ष को लेकर भी उठाए सवाल
CJP फाउंडर ने सवाल उठाया कि यदि वोटर लिस्ट में बदलावों का असर प्रमुख विपक्षी नेताओं और क्षेत्रीय दलों पर पड़ता है, तो क्या यह महज प्रशासनिक प्रक्रिया है या इसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक प्रभाव हो सकता है।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में मतदाता को अपनी सरकार चुनने का अधिकार होना चाहिए और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी है। हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से कहा गया है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया संबंधित वैधानिक अधिकारियों के माध्यम से कानून के तहत की जाती है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह पूरा विवाद ?
SIR को लेकर विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध मतदाता सूची की शुद्धता, पात्र मतदाताओं के नाम शामिल करने और गलत या अपात्र नामों को हटाने की प्रक्रिया से है।
इसी वजह से चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों और आयोग की आधिकारिक प्रतिक्रिया दोनों महत्वपूर्ण हैं। एक ओर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों में प्रक्रिया, Form-6, डेटाबेस एक्सेस और वोटर रिकॉर्ड से जुड़े सवाल सामने आए हैं। दूसरी ओर EC का कहना है कि ये टिप्पणियां निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा थीं और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
अब CJP के 48 घंटे के अल्टीमेटम के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग इस मांग पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और क्या इस मुद्दे को लेकर कोई आधिकारिक या न्यायिक कार्रवाई आगे बढ़ती है।
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