Subhash Chandra FIR : CBI ने जी ग्रुप के फाउंडर सुभाष चंद्रा समेत चार लोगों के खिलाफ ₹1,322 करोड़ से ज्यादा की कथित धोखाधड़ी के मामले में FIR दर्ज की है। यह कार्रवाई LIC हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (LIC HFL) की शिकायत के आधार पर की गई है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि लोन लेने के लिए फर्जी नेटवर्थ सर्टिफिकेट का इस्तेमाल किया गया और उसमें सुभाष चंद्रा की संपत्ति वास्तविकता से कई गुना ज्यादा दिखाई गई।

Written by Kajal Panchal • Published on : 5 September 2026
IBN24 NEWS NETWORK : CBI की FIR में सुभाष चंद्रा के अलावा पंकज सुरोलिया, अमिश पांड्या और राजीव ढोलकिया को भी आरोपी बनाया गया है। चारों पर वर्ष 2018 से 2026 के बीच धोखाधड़ी, अमानत में खयानत और आपराधिक साजिश जैसे आरोप लगाए गए हैं।
सुभाष चंद्रा एस्सेल ग्रुप के प्रमुख और जी मीडिया से जुड़े कारोबारी हैं। वह जी एंटरटेनमेंट के पूर्व चेयरमैन भी रह चुके हैं।
लोन लेने के लिए दिखाई गई ₹59,113 करोड़ की नेटवर्थ
LIC HFL की शिकायत के मुताबिक, वर्ष 2018 में सुभाष चंद्रा ने मेसर्स वसंत सागर प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड समेत अपनी अन्य कंपनियों के लिए लोन लिया था। लोन मंजूर कराने के लिए कथित तौर पर एक नेटवर्थ सर्टिफिकेट प्रस्तुत किया गया, जिसमें सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत कुल संपत्ति ₹59,113 करोड़ बताई गई थी।

LIC का आरोप है कि इसी नेटवर्थ को आधार बनाकर उनकी कंपनियों को ₹1,322 करोड़ से ज्यादा का लोन दिया गया। हालांकि, बाद में एस्सेल ग्रुप की कंपनियां कर्ज चुकाने में असफल रहीं। इसके बाद सुभाष चंद्रा से जुड़ी दिवालिया प्रक्रिया के दौरान उनकी बताई गई नेटवर्थ को लेकर सवाल उठे।
बाद में नेटवर्थ से किया इनकार
LIC के मुताबिक, दिवालिया प्रक्रिया के दौरान सुभाष चंद्रा ने कथित तौर पर कहा कि उनकी संपत्ति कभी उतनी थी ही नहीं, जितनी लोन लेते समय जमा किए गए दस्तावेजों में दिखाई गई थी।
बताया गया है कि वर्ष 2024 में उनकी कुल नेटवर्थ करीब ₹31.79 करोड़ बताई गई। वहीं, चंद्रा की ओर से यह भी कहा गया कि वर्ष 2017-18 में उनकी संपत्ति ₹40,000 करोड़ से अधिक नहीं थी। यही अंतर अब CBI की जांच के केंद्र में है कि लोन लेते समय इतनी बड़ी नेटवर्थ किस आधार पर दिखाई गई और इसके आधार पर करोड़ों रुपये का कर्ज कैसे मंजूर हुआ।
₹22,000 करोड़ की देनदारी के बदले ₹6.5 करोड़ का ऑफर
सुभाष चंद्रा से जुड़ी दिवालिया प्रक्रिया पहले भी विवादों में रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब ₹22,000 करोड़ की देनदारी के बदले महज ₹6.5 करोड़ देकर मामला खत्म करने का प्रस्ताव सामने आया था।

NCLT यानी नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल की सिंगल बेंच ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था। हालांकि, फैसले को लेकर विवाद हुआ और बाद में मामले की सुनवाई के लिए 5 जजों की बड़ी बेंच गठित की गई। सुभाष चंद्रा की ओर से इस बड़ी बेंच के गठन का विरोध किए जाने की बात भी सामने आई है।
क्या है NCLT और क्यों अहम है ?
NCLT (National Company Law Tribunal) कंपनियों और कारोबार से जुड़े विवादों तथा दिवालिया प्रक्रिया के मामलों की सुनवाई करने वाला विशेष न्यायिक मंच है।
जब कोई कंपनी अपना कर्ज चुकाने में असमर्थ होती है या दिवालिया प्रक्रिया में जाती है, तो बैंक और अन्य कर्जदाता वसूली या समाधान प्रक्रिया के लिए NCLT का रुख कर सकते हैं। NCLT की कार्यवाही में कंपनी की वित्तीय स्थिति, कर्ज, लेनदारों के दावे और समाधान योजनाओं जैसे मामलों पर सुनवाई होती है।
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