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Subhash Chandra Debt Case : सुभाष चंद्रा बोले- ₹22,000 करोड़ के कर्ज पर फैलाया गया भ्रम, ‘मेरी निजी उधारी शून्य’, जानिए सुभाष चंद्रा के दस्तावेज में क्या दावा किया गया ?

Subhash Chandra Debt Case : Zee Group के फाउंडर और हरियाणा के पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. सुभाष चंद्रा ने ₹22,000 करोड़ के कर्ज से जुड़े विवाद पर सफाई दी है। NCLT द्वारा उनके पर्सनल इंसॉल्वेंसी मामले में ₹22,006.57 करोड़ के दावों के मुकाबले ₹6.5 करोड़ के रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दिए जाने के बाद सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं।

Subhash Chandra Debt Case

Written by Kajal Panchal • Published on : 31 August 2026

IBN24 NEWS NETWORK : चंद्रा ने दावा किया कि ₹22,000 करोड़ उनकी व्यक्तिगत उधारी नहीं, बल्कि अलग-अलग कंपनियों के कर्ज से जुड़ी व्यक्तिगत गारंटी का कुल दावा है।

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सोशल मीडिया विवाद के बीच सुभाष चंद्रा ने दी सफाई

NCLT के फैसले के बाद सोशल मीडिया पर #PaisaVapasKaro ट्रेंड हुआ। इसी बीच सुभाष चंद्रा सोमवार सुबह सोशल मीडिया पर लाइव आए और तीन पन्नों का एक दस्तावेज साझा किया।

Subhash Chandra Debt Case

चंद्रा ने दावा किया कि इस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर गलत धारणा और अधूरी जानकारी फैलाई जा रही है। उन्होंने कहा कि ₹22,000 करोड़ की रकम उनकी निजी उधारी नहीं है। हालांकि, लाइव के दौरान कमेंट सेक्शन लॉक रखा गया था, इसलिए दर्शकों की ओर से तत्काल सवाल-जवाब नहीं हो सके।

विवाद तब बढ़ा जब विजय माल्या ने NCLT के फैसले पर सवाल उठाए

इस मामले में भगोड़े कारोबारी विजय माल्या की सोशल मीडिया पोस्ट ने भी विवाद को हवा दी। माल्या ने NCLT के फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे भारतीय न्याय व्यवस्था का मजाक बताया और ₹22,000 करोड़ के दावे के मुकाबले बेहद कम रकम में मामला निपटाए जाने पर आपत्ति जताई। इसके बाद सुभाष चंद्रा ने अपने दस्तावेजों के जरिए पूरे मामले की अलग तस्वीर पेश करने की कोशिश की।

सुभाष चंद्रा के दस्तावेज में क्या दावा किया गया ?

Subhash Chandra Debt Case

1. निजी उधारी शून्य होने का दावा : सुभाष चंद्रा के मुताबिक, उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर ₹22,000 करोड़ का कोई कर्ज नहीं लिया था। यह राशि उनके द्वारा अलग-अलग कंपनियों के कर्ज के लिए दी गई पर्सनल गारंटी से जुड़े दावों का कुल आंकड़ा है।

2. मूल कर्ज के समय करीब ₹4,800 करोड़ की गारंटी : चंद्रा के दस्तावेज के अनुसार, ₹22,000 करोड़ की कुल पर्सनल गारंटी में से करीब ₹4,800 करोड़ की गारंटी उस समय दी गई थी, जब कंपनियों ने मूल रूप से कर्ज लिया था। उनका दावा है कि बाकी गारंटी कंपनियों के डिफॉल्ट के बाद दी गई थीं।

3. ₹4,808 करोड़ में से ₹3,803 करोड़ चुकाए जाने का दावा : दस्तावेज में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, बैंकों और वित्तीय संस्थानों से कुल ₹4,808 करोड़ का डिस्बर्समेंट हुआ था। इनमें से करीब ₹3,803 करोड़ की राशि वापस चुकाई जा चुकी है और करीब ₹998 करोड़ मूलधन बाकी बताया गया है।

4. ₹5,311 करोड़ के दावे के मुकाबले ₹4,262 करोड़ शेष : चंद्रा की ओर से जारी आंकड़ों में कहा गया है कि ₹998 करोड़ के मूल बकाए के खिलाफ बैंकों ने करीब ₹5,311 करोड़ का दावा किया था। इनमें से ₹1,049 करोड़ के दावों का निपटारा या भुगतान हो चुका है। इसके बाद दस्तावेज में ₹4,262 करोड़ का शेष दावा बताया गया है।

5. बाकी देनदारियों के निपटारे का भरोसा : चंद्रा ने दावा किया कि उन्होंने संबंधित उधारकर्ताओं से बात की है और लेंडर्स के साथ खातों का मिलान होने के बाद शेष राशि का भुगतान और निपटारा करने का भरोसा दिया गया है।

NCLT ने ₹22,006 करोड़ के दावे के बदले ₹6.5 करोड़ का प्लान क्यों मंजूर किया?

मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ₹22,006.57 करोड़ के कुल दावों के मुकाबले सिर्फ ₹6.5 करोड़ के रीपेमेंट प्लान को मंजूरी कैसे मिली? NCLT ने सुभाष चंद्रा के पर्सनल इंसॉल्वेंसी मामले में इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड की धारा 114 के तहत रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी।

रिपोर्ट के मुताबिक, इससे पहले NCLT की दो सदस्यीय बेंच में इस मामले पर अलग-अलग राय सामने आई थी। इसके बाद NCLT चेयरमैन ने तीसरे सदस्य के तौर पर जुडिशियल मेंबर नीलेश शर्मा को जोड़ा। बहुमत के आधार पर रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी गई।

क्या सुभाष चंद्रा ने खुद ₹22,000 करोड़ का लोन लिया था?

नहीं। यहां पर्सनल लोन और पर्सनल गारंटी के बीच अंतर समझना जरूरी है। किसी कंपनी को बैंक कर्ज देता है और कंपनी के प्रमोटर व्यक्तिगत गारंटी देता है कि अगर कंपनी कर्ज नहीं चुकाती तो वह भुगतान की जिम्मेदारी लेगा। इस मामले में सुभाष चंद्रा ने एस्सेल ग्रुप की कंपनियों के लिए कई कर्जदाताओं को ऐसी व्यक्तिगत गारंटी दी थी।

कंपनियों के डिफॉल्ट के बाद इन गारंटियों से जुड़े दावे उनके खिलाफ व्यक्तिगत इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया में शामिल हुए।

मामला ₹178 करोड़ से ₹22,000 करोड़ तक कैसे पहुंचा?

इस विवाद की शुरुआत 2016 में इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस से जुड़े करीब ₹726 करोड़ के लोन से हुई थी। बाद में सुभाष चंद्रा व्यक्तिगत गारंटर बने। कंपनियों के डिफॉल्ट के बाद उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू हुई।

जैसे-जैसे इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया आगे बढ़ी, एस्सेल ग्रुप की अलग-अलग कंपनियों को दिए गए कर्ज के लिए अन्य बैंकों और वित्तीय संस्थानों की ओर से भी दावे सामने आए। इनमें HDFC, Axis Bank, Canara Bank, RBL Bank समेत कई अन्य संस्थानों से जुड़े दावे शामिल थे। पुराने कर्ज, ब्याज और अन्य देनदारियों को मिलाकर पर्सनल गारंटी से जुड़े कुल दावे बढ़ते हुए ₹22,006.57 करोड़ तक पहुंच गए।

किन बैंकों और संस्थानों के दावे सामने आए ?

सुभाष चंद्रा की ओर से जारी दस्तावेज में कई प्रमुख लेंडर्स का जिक्र किया गया है।

इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस

दस्तावेज के मुताबिक, करीब ₹726 करोड़ के लोन के मुकाबले ₹771 करोड़ की राशि वापस किए जाने का दावा किया गया है। व्यक्तिगत दिवालियापन प्रक्रिया शुरू होने के बाद इसे पूरी तरह सेटल किए जाने की बात कही गई है।

एक्सिस बैंक ग्रुप

करीब ₹388 करोड़ के डिस्बर्समेंट में से ₹157 करोड़ चुकाए जाने और बाकी राशि के लिए सेटलमेंट प्रक्रिया जारी होने का दावा किया गया है।

अन्य प्रमुख लेंडर्स

HDFC ग्रुप, Canara Bank, Edelweiss, Franklin Templeton, IndusInd Bank, LIC Housing Finance, RBL Bank और Union Bank समेत अन्य संस्थानों के दावों और सेटलमेंट प्रक्रिया का भी दस्तावेज में उल्लेख है।

LIC Housing Finance ने क्यों जताई थी आपत्ति ?

रीपेमेंट प्लान का कुछ कर्जदाताओं ने विरोध भी किया था। LIC Housing Finance की ओर से योजना पर आपत्ति जताते हुए इसे अव्यावहारिक और गैर-कानूनी बताया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, LIC Housing Finance ने करीब ₹1,322.39 करोड़ के दावे के बदले सिर्फ ₹38.09 लाख मिलने पर सवाल उठाया था। हालांकि, NCLT के सामने रीपेमेंट प्लान को आवश्यक बहुमत का समर्थन मिला।

80.81% वोटिंग शेयर से मिली मंजूरी

NCLT के फैसले में बताया गया कि रीपेमेंट प्लान को 80.81% वोटिंग शेयर रखने वाले कर्जदाताओं की मंजूरी प्राप्त थी। विरोध करने वाले कर्जदाताओं की वोटिंग हिस्सेदारी 20% से कम थी। आवश्यक बहुमत मिलने के बाद ट्रिब्यूनल ने आपत्तियों को खारिज करते हुए प्लान को मंजूरी दी।

क्या बैंकों का पूरा ₹22,000 करोड़ डूब गया ?

जरूरी नहीं। यही इस पूरे विवाद का एक अहम पहलू है। बताए गए 99% से अधिक के हेयरकट का संबंध सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत गारंटी से जुड़े क्लेम से है। मूल कर्ज लेने वाली कंपनियों की देनदारी और उनसे वसूली का सवाल अलग है।

कर्जदाता मूल कंपनियों की संपत्तियों, सिक्योरिटी और अन्य उपलब्ध साधनों से रिकवरी की कार्रवाई जारी रख सकते हैं। यानी ₹22,000 करोड़ का दावा और मूल कंपनियों पर मौजूद वास्तविक कर्ज—दोनों को एक ही चीज मानना सही नहीं होगा।

बैंक 99% नुकसान सहने को तैयार क्यों हुए ?

इस सवाल का जवाब इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया में मौजूद वोटिंग मैकेनिज्म में छिपा है। अगर आवश्यक बहुमत वाले कर्जदाता किसी रीपेमेंट प्लान को स्वीकार कर लेते हैं, तो NCLT उस योजना को कानूनी प्रक्रिया के तहत मंजूरी दे सकता है।

इस मामले में भी अधिकांश वोटिंग शेयर वाले कर्जदाताओं ने योजना के पक्ष में मतदान किया। इसके बाद असहमति रखने वाले कुछ कर्जदाताओं की आपत्तियां बहुमत के फैसले के सामने टिक नहीं सकीं।

अब सबसे बड़ा सवाल क्या है ?

सुभाष चंद्रा का कहना है कि ₹22,000 करोड़ उनकी व्यक्तिगत उधारी नहीं थी, जबकि NCLT के रिकॉर्ड में उनके खिलाफ पर्सनल गारंटी से जुड़े हजारों करोड़ रुपये के दावे शामिल थे। एक तरफ बेहद कम रकम वाले रीपेमेंट प्लान को मंजूरी मिली है, तो दूसरी तरफ कुछ कर्जदाता इस फैसले पर गंभीर सवाल उठा चुके हैं।

अब देखने वाली बात होगी कि क्या इस फैसले के बाद बाकी कर्ज की रिकवरी मूल कंपनियों से हो पाती है और क्या सुभाष चंद्रा द्वारा बताए गए ₹4,262 करोड़ के शेष दावों का वास्तव में निपटारा होता है?

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