Sugar Price Hike : देश में चीनी की बढ़ती कीमतों ने आम लोगों और सरकार दोनों की चिंता बढ़ा दी है। कई शहरों में चीनी का खुदरा भाव ₹70 प्रति किलो तक पहुंच गया है, जबकि पिछले कुछ महीनों में कीमतों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी (Raw Sugar) को 31 अक्टूबर 2026 तक ड्यूटी-फ्री आयात करने की अनुमति दी है। यह कदम घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाने और त्योहारों से पहले कीमतों पर दबाव कम करने के लिए उठाया गया है।

Written by Kajal Panchal • Published on : 22 August 2026
IBN24 NEWS NETWORK : चीनी की कीमतों को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने शनिवार को केंद्र सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि जब भारत दुनिया के बड़े चीनी उत्पादक देशों में शामिल है, तो विदेश से चीनी आयात करने की जरूरत क्यों पड़ी? उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि गन्ने का इस्तेमाल एथेनॉल बनाने में करने की नीति का चीनी की घरेलू उपलब्धता और कीमतों पर कितना असर पड़ा है।
चीनी की कीमतों में क्यों आया उछाल ?
सरकार के मुताबिक, चीनी की कीमतों में मौजूदा तेजी के पीछे केवल एथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा के अनुसार, घरेलू चीनी उत्पादन में कमी, त्योहारों से पहले बढ़ती मांग, गन्ने की फसल पर मौसम और बीमारियों का असर तथा बाजार में सप्लाई को लेकर बनी चिंता कीमत बढ़ने की प्रमुख वजहों में शामिल हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 20 जुलाई को अखिल भारतीय औसत खुदरा चीनी कीमत करीब ₹48 प्रति किलो थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर करीब ₹56 प्रति किलो हो गई। इसी अवधि में एक्स-मिल कीमत करीब ₹47-48 प्रति किलो से बढ़कर लगभग ₹62 प्रति किलो पहुंच गई। सरकार ने इतनी तेज बढ़ोतरी को उचित नहीं माना है।
वहीं, कुछ बाजारों में कीमत इससे भी ज्यादा है। मुंबई में 20 अगस्त को चीनी करीब ₹64 प्रति किलो बिक रही थी, जबकि कोलकाता में कीमत ₹70 प्रति किलो तक पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई।
खड़गे ने सरकार से पूछे ये सवाल
मल्लिकार्जुन खड़गे ने चीनी की कीमतों और उपलब्धता को लेकर केंद्र सरकार से सवाल उठाए। उनका कहना है कि एक तरफ भारत को चीनी का आयात करना पड़ रहा है और दूसरी तरफ गन्ने का इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन के लिए किया जा रहा है। उन्होंने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि चीनी की उपलब्धता, कीमत और स्टॉक को लेकर उसकी नीति क्या है।
खड़गे ने बढ़ती कीमतों को लेकर सरकार की आत्मनिर्भर भारत नीति पर भी सवाल उठाया और पूछा कि दुनिया के बड़े चीनी उत्पादक देशों में शामिल भारत को करीब एक दशक बाद चीनी आयात करने की जरूरत क्यों पड़ी।
सरकार बोली- एथेनॉल से नहीं बढ़े चीनी के दाम
केंद्र सरकार ने चीनी की कीमतों में आई तेजी के लिए एथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार मानने से इनकार किया है। खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने कहा कि एथेनॉल के लिए चीनी डायवर्ट किए जाने की मात्रा पहले की तुलना में कम हुई है।
सरकार के मुताबिक, 2022-23 में करीब 43 लाख टन चीनी एथेनॉल के लिए डायवर्ट की गई थी, जो कुल चीनी स्टॉक का लगभग 12% था। मौजूदा 2025-26 सीजन में करीब 28 लाख टन चीनी एथेनॉल के लिए डायवर्ट की गई है। सरकार का कहना है कि इसलिए मौजूदा कीमत बढ़ोतरी को सिर्फ एथेनॉल नीति से जोड़ना सही नहीं है।
खाद्य सचिव ने यह भी बताया कि देश में एथेनॉल उत्पादन के लिए अब अनाज, खासकर मक्का, की भूमिका काफी बढ़ी है। उनके अनुसार, मौजूदा समय में शुगर से बनने वाला एथेनॉल कुल उत्पादन का करीब एक-चौथाई हिस्सा है।
इस साल चीनी का उत्पादन क्यों घटा ?
सरकार के मुताबिक, 2025-26 शुगर सीजन में चीनी उत्पादन का अनुमान अब करीब 306 लाख टन रह गया है। यह गन्ना उत्पादक राज्यों द्वारा लगाए गए शुरुआती 343 लाख टन के अनुमान से लगभग 11% कम है।

उत्पादन में कमी के पीछे गन्ने की फसल में Red Rot और Top Borer जैसी बीमारियों के साथ-साथ ज्यादा बारिश और जलभराव को भी वजह बताया गया है। इन कारणों से प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में फसल प्रभावित हुई और चीनी उत्पादन का अनुमान नीचे आया।
9 साल बाद भारत क्यों कर रहा है चीनी का आयात ?
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है। इसके बावजूद घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ने के बाद केंद्र ने करीब एक दशक बाद कच्ची चीनी के आयात की अनुमति दी है।
20 अगस्त 2026 को DGFT ने 10 लाख मीट्रिक टन Raw Sugar को 31 अक्टूबर 2026 तक ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति दी। यह आयात Tariff Rate Quota (TRQ) के तहत होगा। भारत में सामान्य तौर पर चीनी के आयात पर ऊंची ड्यूटी लागू होती है, इसलिए यह फैसला घरेलू सप्लाई बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सरकार को उम्मीद है कि आयातित कच्ची चीनी को घरेलू स्तर पर रिफाइन करके बाजार में उपलब्ध कराने से सप्लाई बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव कम होगा।
चीनी के अलावा गुड़, चावल और मक्के के आटे के दाम भी बढ़े
चीनी की महंगाई के साथ कुछ अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में गुड़ की कीमत करीब 24%, चावल की कीमत 16% और मक्के के आटे की कीमत करीब 11% तक बढ़ी है।

खाद्य वस्तुओं की कीमतों में यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है जब देश में त्योहारों का सीजन शुरू होने वाला है। इस दौरान मिठाइयों, पेय पदार्थों और अन्य खाद्य उत्पादों में चीनी की मांग बढ़ने की संभावना रहती है।
सरकार ने जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक लिमिट लगाई
चीनी की कीमतों को नियंत्रित करने और जमाखोरी रोकने के लिए केंद्र सरकार ने स्टॉक होल्डिंग लिमिट भी लागू की है। 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक चीनी डीलरों के स्टॉक पर सीमा लागू है। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य जमाखोरी और सट्टेबाजी पर रोक लगाना तथा बाजार में नियमित सप्लाई बनाए रखना है। =
इसके अलावा, 1 सितंबर से 30 नवंबर तक ऐसे बड़े थोक खरीदार जो हर महीने 10 टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करते हैं, वे 15 दिन की खपत से अधिक स्टॉक नहीं रख सकेंगे। यह नियम कन्फेक्शनरी, सॉफ्ट ड्रिंक, फूड प्रोसेसिंग और मिठाई कारोबार जैसे बड़े उपभोक्ताओं पर लागू होगा।
अक्टूबर में बढ़ सकती है चीनी की सप्लाई
सरकार को उम्मीद है कि अक्टूबर के आसपास नया गन्ना पेराई सीजन शुरू होने के बाद बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी। इसके साथ ही 10 लाख टन कच्ची चीनी का ड्यूटी-फ्री आयात भी घरेलू सप्लाई को मजबूत करने में मदद कर सकता है।
सरकार का कहना है कि देश में घरेलू खपत पूरी करने के लिए पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है और हालिया कदमों के बाद कीमतों में नरमी आने की उम्मीद है। खाद्य सचिव ने भी कहा है कि मौजूदा तेजी के बाद सरकार की ओर से किए गए हस्तक्षेप का असर आने वाले दिनों में कीमतों पर दिखाई दे सकता है।
क्या आम लोगों को चीनी के दाम में राहत मिलेगी ?
सरकार की ओर से ड्यूटी-फ्री आयात, स्टॉक लिमिट और बाजार में अतिरिक्त सप्लाई बढ़ाने के कदम उठाए गए हैं। इसका उद्देश्य त्योहारी सीजन में चीनी की कमी और कीमतों में अनियंत्रित बढ़ोतरी को रोकना है।
हालांकि, खुदरा कीमतों में कितनी और कब तक गिरावट आती है, यह आयातित चीनी की उपलब्धता, घरेलू उत्पादन, त्योहारों के दौरान मांग और बाजार में मिलों की बिक्री पर निर्भर करेगा। फिलहाल सरकार का फोकस चीनी की पर्याप्त सप्लाई बनाए रखने और जमाखोरी रोकने पर है।
स्रोत: खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय, DGFT, PIB और समाचार एजेंसियों की रिपोर्ट्स।
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