PM Modi Meets Sukhbir Badal : पंजाब विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने शुक्रवार को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इसके बाद पंजाब की राजनीति में अकाली दल और भाजपा के फिर से साथ आने की चर्चा शुरू हो गई है।

Written by Kajal Panchal • Published on : 7 August 2026
IBN24 NEWS NETWORK : हालांकि, दोनों दलों की ओर से गठबंधन को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। फिर भी राजनीतिक गलियारों में इसे संभावित गठबंधन की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
संसद भवन में हुई दोनों नेताओं की मुलाकात
सुखबीर सिंह बादल शुक्रवार सुबह दिल्ली पहुंचे। इसके बाद उन्होंने संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की।

यह मुलाकात ऐसे समय हुई है, जब पंजाब विधानसभा चुनाव में लगभग चार से पांच महीने का समय बचा है। इसलिए माना जा रहा है कि दोनों दल चुनाव से पहले एक बार फिर साथ आ सकते हैं।
केजरीवाल ने कसा तंज
प्रधानमंत्री मोदी और सुखबीर बादल की मुलाकात पर आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर तंज कसा।
उन्होंने लिखा—
“ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे… तो क्या चंदा चोर पार्टी और बेअदबी पार्टी का गठबंधन हो रहा है?”
इसके बाद यह मुद्दा राजनीतिक बहस का विषय बन गया।
सुखबीर बादल ने दिया जवाब
केजरीवाल के बयान पर सुखबीर बादल ने भी पलटवार किया।

उन्होंने कहा कि 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी ने पंजाब में ₹20,000 करोड़ के अवैध खनन को बंद करने का वादा किया था। अब राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेश ने साबित कर दिया है कि सरकार अपने वादों पर खरी नहीं उतरी।
कांग्रेस ने भी साधा निशाना
पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने भी इस संभावित गठबंधन पर प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने कहा कि उन्हें पहले से ही उम्मीद थी कि दोनों दल फिर साथ आएंगे। हालांकि, उनके अनुसार इससे पंजाब की राजनीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा।
25 साल तक साथ रहे अकाली दल और भाजपा
अकाली दल और भाजपा का गठबंधन वर्ष 1996 में हुआ था। इसके बाद दोनों दल करीब 25 साल तक साथ रहे।
इस दौरान दोनों पार्टियों ने मिलकर तीन बार सरकार बनाई।
- 1997 में पहली बार सरकार बनी।
- 2007 में दोबारा सत्ता मिली।
- 2012 में लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में सफलता मिली।
पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल इस रिश्ते को “नौह-मास का रिश्ता” कहा करते थे। पंजाबी में इसका मतलब नाखून और त्वचा जैसा मजबूत संबंध होता है।
फिर क्यों टूटा गठबंधन ?
वर्ष 2020 में कृषि कानूनों को लेकर विवाद शुरू हुआ। शुरुआत में अकाली दल ने केंद्र सरकार के कृषि कानूनों का समर्थन किया। हालांकि, किसानों के विरोध के बाद पार्टी ने अपना रुख बदल लिया। इसी दौरान तत्कालीन केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।
इसके कुछ समय बाद अकाली दल ने करीब 26 साल पुराना भाजपा से गठबंधन भी खत्म कर दिया। पार्टी का मानना था कि यदि वह भाजपा के साथ रहती, तो उसका पारंपरिक किसान और ग्रामीण वोट बैंक प्रभावित हो सकता था।
2022 चुनाव में क्या हुआ ?
गठबंधन टूटने के बाद दोनों दल अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरे। इसका असर चुनाव परिणामों में भी दिखाई दिया।
- भाजपा केवल 2 सीटें जीत सकी।
- अकाली दल को सिर्फ 3 सीटें मिलीं।
दोनों दल सिंगल डिजिट में सिमट गए।
किसे मिला सबसे बड़ा फायदा ?
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. कृष्ण कुमार रत्तू के अनुसार, गठबंधन टूटने का सबसे बड़ा फायदा आम आदमी पार्टी को मिला।
उन्होंने कहा कि भाजपा और अकाली दल के अलग-अलग चुनाव लड़ने से पारंपरिक वोट बैंक बंट गया। इसका लाभ AAP को मिला और पार्टी ने भारी बहुमत के साथ सरकार बना ली।
वहीं, कांग्रेस का वोट समीकरण भी कमजोर पड़ गया।
क्या 2027 में बदल सकती है पंजाब की राजनीति ?
विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा और अकाली दल फिर से गठबंधन करते हैं, तो पंजाब की चुनावी लड़ाई पहले से अधिक दिलचस्प हो सकती है।
ऐसी स्थिति में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों के सामने नई चुनौती खड़ी हो सकती है। हालांकि, गठबंधन होगा या नहीं, इसका फैसला दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व की आधिकारिक घोषणा के बाद ही साफ होगा।
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