Bhojshala High Court Verdict : मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के भोजशाला मामले में आए ऐतिहासिक फैसले ने सिर्फ धार ही नहीं, बल्कि पूरे देश में धार्मिक स्थलों से जुड़े पुराने विवादों पर नई बहस छेड़ दी है। अदालत ने भोजशाला को देवी वाग्देवी का मंदिर मानते हुए 23 साल पुरानी व्यवस्था को बदल दिया, जिसके बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या आने वाले समय में देशभर के अन्य विवादित धार्मिक स्थलों को लेकर भी कानूनी लड़ाइयां तेज होंगी?

फैसले के बाद जहां हिंदू पक्ष इसे आस्था और इतिहास की जीत बता रहा है, वहीं मुस्लिम पक्ष ने आगे की कानूनी रणनीति के संकेत दिए हैं।
Written by Kajal Panchal • Published on : 15 May 2026
IBN24 News Network : शुक्रवार को सुनाए गए महत्वपूर्ण फैसले में अदालत ने कहा कि यह एक ऐतिहासिक और संरक्षित धार्मिक स्थल है तथा इसका प्रबंधन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन रहेगा। कोर्ट ने केंद्र सरकार और ASI को निर्देश दिया है कि वे तय करें कि भोजशाला मंदिर का प्रबंधन किस प्रकार संचालित किया जाएगा।
अदालत ने ASI के वर्ष 2003 के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें हिंदू पक्ष को नियमित पूजा का पूर्ण अधिकार नहीं दिया गया था। साथ ही मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति देने वाले आदेश को भी रद्द कर दिया गया।
मुस्लिम पक्ष लंबे समय से इस स्थल को “कमाल मौला मस्जिद” बताता रहा है। हाईकोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए वैकल्पिक भूमि मांगने का सुझाव दिया है।
क्या है भोजशाला विवाद ?
धार की भोजशाला लंबे समय से धार्मिक और ऐतिहासिक विवाद का केंद्र रही है। हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर और विद्या केंद्र मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है।
2003 से प्रशासनिक व्यवस्था के तहत यहां मंगलवार और वसंत पंचमी पर हिंदुओं को पूजा की अनुमति तथा शुक्रवार को मुस्लिम समाज को नमाज की अनुमति दी जाती थी। अन्य दिनों में परिसर पर्यटकों के लिए खुला रहता था।
कोर्ट में हिंदू पक्ष के प्रमुख तर्क

हिंदू पक्ष की ओर से अधिवक्ताओं ने अदालत में कहा कि:
- भोजशाला ASI द्वारा संरक्षित स्मारक है, इसलिए इस पर प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट लागू नहीं होता।
- प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1951 की सूची में भोजशाला का नाम दर्ज है।
- 7 अप्रैल 2003 को ASI द्वारा जारी आदेश असंवैधानिक था।
- भोजशाला को पूर्ण रूप से हिंदू समाज को सौंपा जाए ताकि वर्षभर पूजा-अर्चना और हवन निर्बाध रूप से हो सके।
अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने परमार राजा भोज के ग्रंथ समरांगण सूत्रधार का उल्लेख करते हुए कहा कि भोजशाला की संरचना प्राचीन मंदिर वास्तुशास्त्र के अनुरूप है।
मुस्लिम पक्ष ने क्या कहा ?
मुस्लिम पक्ष की ओर से कहा गया है कि:
- अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि स्थल मंदिर है, मस्जिद है या जैनशाला।
- धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है, न कि हाईकोर्ट को।
- ASI की सर्वे रिपोर्ट और वीडियोग्राफी स्पष्ट नहीं थीं।
- अयोध्या मामले के विपरीत यहां कोई स्थापित मूर्ति मौजूद नहीं है।
मुस्लिम पक्ष ने यह भी कहा कि परिसर लंबे समय से कमाल मौला मस्जिद के रूप में उपयोग में रहा है।
जैन समाज का दावा भी सामने आया
जैन समाज ने कोर्ट में दावा किया कि जिस प्रतिमा को मां वाग्देवी कहा जा रहा है, वह वास्तव में जैन समुदाय की आराध्य मां अंबिका की प्रतिमा है। जैन पक्ष ने भोजशाला को जैन तीर्थ घोषित करने की मांग की।
2022 में दायर हुई थी याचिका
यह कानूनी विवाद वर्ष 2022 में तब तेज हुआ जब रंजना अग्निहोत्री और अन्य याचिकाकर्ताओं ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
याचिका में मांग की गई थी कि:
- भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय किया जाए,
- हिंदू समाज को पूर्ण अधिकार दिए जाएं,
- परिसर में नमाज पर रोक लगे,
- ट्रस्ट का गठन किया जाए,
- ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की प्रतिमा वापस लाई जाए।
ASI ने किया था 98 दिन का वैज्ञानिक सर्वे

सुरक्षा के कड़े इंतजाम
फैसले के बाद धार में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। जिलेभर से करीब 1200 पुलिसकर्मियों को बुलाया गया है। रिजर्व पुलिस बल और रैपिड एक्शन फोर्स को भी अलर्ट पर रखा गया है।
एसपी सचिन शर्मा ने बताया कि धार शहर की सुरक्षा 12 लेयर में की गई है और संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त निगरानी रखी जा रही है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला ?
भोजशाला विवाद पर आया यह फैसला केवल धार्मिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक, कानूनी और सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत के निर्णय से आने वाले समय में देशभर के धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला आगे सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है, क्योंकि इसमें धार्मिक अधिकार, ऐतिहासिक साक्ष्य और संवैधानिक प्रश्न जुड़े हुए हैं।
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