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Gujarat High Court on Child Murder Case : खाना मांगने पर 2 साल की बेटी की हत्या के आरोप में मां को जमानत, गुजरात हाईकोर्ट बोला- यह समाज की सामूहिक विफलता; क्यों की यह टिप्पणी ?

Gujarat High Court on Child Murder Case : गुजरात हाईकोर्ट ने अपनी दो साल की बेटी की कथित तौर पर पीट-पीटकर हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार महिला को जमानत दे दी है। अदालत ने इस मामले को केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि समाज और राज्य की सामूहिक विफलता करार दिया। कोर्ट ने कहा कि जब भूख किसी मां को इतना कठोर कदम उठाने पर मजबूर कर दे, तो यह केवल एक व्यक्ति की असफलता नहीं बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी बन जाती है।

Gujarat High Court on Child Murder Case

Written by Kajal Panchal • Published on : 6 August 2026

IBN24 NEWS NETWORK : जस्टिस हसमुख डी. सुथार की एकल पीठ ने अपने आदेश में कहा कि यह घटना बेहद हृदयविदारक है और भूख केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, न्याय और सामाजिक विवेक से जुड़ा विषय है।

क्या है पूरा मामला ?

मामला गुजरात के सूरत जिले के वराछा थाना क्षेत्र का है। आरोपी महिला लखीबेन सोलंकी को मार्च 2026 में अपनी दो वर्षीय बेटी की कथित हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

Gujarat High Court on Child Murder Case

आरोप है कि बच्ची ने खाना मांगा था, जिसके बाद महिला ने उसकी पिटाई कर दी। गंभीर चोटों के कारण बच्ची की मौत हो गई। मामले में पुलिस ने हत्या का केस दर्ज कर महिला को गिरफ्तार किया था।

कोर्ट ने क्या कहा ?

जमानत देते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला गरीबी, भुखमरी और सामाजिक सुरक्षा तंत्र की विफलता की ओर इशारा करता है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि:

  • जब भूख किसी मां को ऐसा कठोर कदम उठाने पर मजबूर कर दे, तो यह व्यक्ति नहीं बल्कि समाज की सामूहिक विफलता है।
  • कमजोर परिवारों, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा करना राज्य और समाज की नैतिक जिम्मेदारी है।
  • यह घटना करुणा, सामाजिक जिम्मेदारी और कल्याणकारी व्यवस्था को मजबूत करने की चेतावनी है।

संविधान का भी किया उल्लेख

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय संविधान के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि:

  • छह वर्ष तक के बच्चों को प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा का मौलिक अधिकार प्राप्त है।
  • राज्य सरकार का दायित्व है कि वह नागरिकों के पोषण स्तर और जीवन स्तर को बेहतर बनाए।

साहित्य और महापुरुषों का दिया हवाला

अपने विस्तृत आदेश में अदालत ने कई साहित्यिक और दार्शनिक संदर्भ भी दिए।

कोर्ट ने गुजराती साहित्यकार पन्नालाल पटेल के उपन्यास ‘मानवीनी भवाई’, फ्रांसीसी लेखक विक्टर ह्यूगो के उपन्यास ‘लेस मिजरेबल्स’, महात्मा गांधी, चार्ल्स डिकेंस, अरस्तू तथा विभिन्न धर्मग्रंथों का उल्लेख करते हुए कहा कि भूखे व्यक्ति को भोजन कराना मानवता का सबसे बड़ा कर्तव्य है।

महिला की स्थिति पर भी कोर्ट ने किया विचार

सुनवाई के दौरान महिला के वकील ने अदालत को बताया कि:

  • महिला सात महीने की गर्भवती है।
  • उसके तीन बच्चे हैं।
  • एक बच्चा उसके साथ जेल में रह रहा है।
  • दूसरा बच्चा घर पर अकेला है।
  • उसका पति उसे छोड़कर जा चुका है।
  • वह एक अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही थी।

इन परिस्थितियों को भी अदालत ने जमानत पर विचार करते समय ध्यान में रखा।

सरकारी पक्ष ने किया विरोध

सरकारी वकील ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि महिला की संलिप्तता प्रथम दृष्टया स्पष्ट है और अपराध गंभीर प्रकृति का है।

हालांकि, अदालत ने माना कि यह मामला गरीबी और भुखमरी से उपजी एक मां की असहायता और विफलता से जुड़ा प्रतीत होता है। इसी आधार पर महिला को जमानत देने का निर्णय लिया गया।

कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यह घटना पूरे समाज के लिए एक चेतावनी है। यदि कमजोर परिवारों तक समय पर भोजन, पोषण और सामाजिक सुरक्षा नहीं पहुंचती, तो ऐसी त्रासदियां दोबारा भी हो सकती हैं। इसलिए सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि कोई भी मां और बच्चा भूख के कारण ऐसी स्थिति में न पहुंचे।

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