New Labour Code 2026 : देश में लंबे समय से चर्चा में रहे नए लेबर कोड्स (New Labour Codes 2026) एक बार फिर सुर्खियों में हैं। वजह है 4 डे वर्किंग वीक यानी हफ्ते में 4 दिन काम और 3 दिन छुट्टी वाला मॉडल। सोशल मीडिया पर इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं। कोई इसे कर्मचारियों के लिए राहत बता रहा है तो कोई इसे “12 घंटे की नौकरी” कहकर सवाल उठा रहा है।

Written by Kajal Panchal • Published on : 12 May 2026
IBN24 News Network : दरअसल, सरकार द्वारा तैयार किए गए नए लेबर कोड्स लागू होने के बाद कंपनियों के पास यह विकल्प होगा कि वे कर्मचारियों के लिए 4 दिन काम और 3 दिन छुट्टी वाला सिस्टम अपनाएं। हालांकि इसे हर कंपनी पर लागू करना अनिवार्य नहीं होगा। यानी यह पूरी तरह कंपनी की पॉलिसी और कर्मचारी की सहमति पर निर्भर करेगा।
4 दिन काम का मतलब कम काम नहीं
कई लोग यह मान रहे हैं कि 4 दिन काम करने का मतलब अब कर्मचारियों को कम घंटे काम करना पड़ेगा, लेकिन ऐसा नहीं है। नए नियमों के अनुसार कुल साप्ताहिक काम के घंटे 48 ही रहेंगे।

अगर कोई कंपनी 5 दिन का वर्किंग सिस्टम अपनाती है तो रोजाना करीब 9 से 10 घंटे काम हो सकता है। वहीं 4 दिन का विकल्प चुनने पर कर्मचारियों को प्रतिदिन लगभग 12 घंटे तक ऑफिस में रहना पड़ सकता है। इसमें ब्रेक टाइम भी शामिल रहेगा।
यानी छुट्टियां बढ़ेंगी, लेकिन काम के कुल घंटे नहीं घटेंगे।
कंपनियों को क्यों पसंद आ सकता है यह मॉडल ?
कॉरपोरेट सेक्टर में लंबे समय से फ्लेक्सिबल वर्क कल्चर की मांग हो रही थी। कोविड के बाद वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर कर्मचारियों की सोच भी बदली है। ऐसे में कई कंपनियां मानती हैं कि लगातार 3 दिन की छुट्टी मिलने से कर्मचारियों की उत्पादकता बढ़ सकती है और मानसिक दबाव कम हो सकता है।
कुछ मल्टीनेशनल कंपनियां पहले से ही अलग-अलग देशों में 4 डे वर्किंग मॉडल पर प्रयोग कर चुकी हैं। अब भारत में भी इसे लेकर रास्ता खुलता दिखाई दे रहा है।
ओवरटाइम पर मिलेगा डबल भुगतान
नए लेबर कोड्स में ओवरटाइम को लेकर भी नियम पहले से ज्यादा सख्त किए गए हैं। यदि किसी कर्मचारी से तय समय से अधिक काम कराया जाता है, तो कंपनी को उसे डबल रेट पर भुगतान करना होगा।

यानी अगर कर्मचारी ने 1 घंटा अतिरिक्त काम किया है, तो उसका भुगतान सामान्य दर से दोगुना माना जाएगा। यह कैलकुलेशन बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ते (DA) के आधार पर होगा।
नियमों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि अगर कोई कर्मचारी शिफ्ट खत्म होने के बाद 15 से 30 मिनट तक अतिरिक्त काम करता है, तो उसे आधे घंटे का ओवरटाइम माना जाएगा। वहीं 30 मिनट से ज्यादा अतिरिक्त समय होने पर पूरा 1 घंटा ओवरटाइम गिना जाएगा।
इससे पहले कई कंपनियां कुछ मिनट के एक्स्ट्रा काम को नजरअंदाज कर देती थीं, लेकिन नए नियमों के बाद ऐसा करना मुश्किल हो सकता है।
ओवरटाइम की भी तय होगी सीमा
सरकार ने कर्मचारियों की सेहत और कार्यस्थल पर संतुलन बनाए रखने के लिए ओवरटाइम की अधिकतम सीमा भी तय की है।

- बिना ओवरटाइम के किसी कर्मचारी से हफ्ते में 48 घंटे से ज्यादा काम नहीं कराया जा सकेगा।
- ओवरटाइम जोड़ने के बाद भी एक दिन में कुल काम 12 घंटे से अधिक नहीं होना चाहिए।
- तीन महीने की अवधि में अधिकतम 125 से 144 घंटे तक ही ओवरटाइम कराया जा सकेगा।
- राज्यों के नियमों के अनुसार इसमें थोड़ा बदलाव संभव है।
नौकरी छोड़ने पर जल्दी मिलेगा बकाया पैसा
नए नियम कर्मचारियों के फुल एंड फाइनल सेटलमेंट को लेकर भी राहत देते हैं।
यदि कोई कर्मचारी इस्तीफा देता है, नौकरी छोड़ता है या कंपनी उसे हटाती है, तो कंपनी को 2 कार्य दिवस के भीतर उसका भुगतान करना होगा। इसमें सैलरी के साथ ओवरटाइम और अन्य बकाया राशि भी शामिल होगी।
अब तक कई कर्मचारियों को महीनों तक अपने फाइनल सेटलमेंट का इंतजार करना पड़ता था। नए नियम लागू होने के बाद इस प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद है।
आखिर क्या हैं ये नए Labour Codes ?
केंद्र सरकार ने देश के 29 पुराने श्रम कानूनों को मिलाकर 4 बड़े लेबर कोड तैयार किए हैं। इनमें वेतन, सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक संबंध और कार्यस्थल की परिस्थितियों से जुड़े नियम शामिल हैं।
हालांकि केंद्र स्तर पर इन कोड्स को मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन इनके पूरी तरह लागू होने के लिए राज्यों को अपने-अपने नियम तैयार करने होंगे। कई राज्यों ने इस दिशा में काम शुरू कर दिया है।
कर्मचारियों की जिंदगी पर क्या पड़ेगा असर ?
अगर ये नियम पूरी तरह लागू होते हैं, तो आने वाले समय में कर्मचारियों की ऑफिस लाइफ में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। कुछ लोगों के लिए 3 दिन की छुट्टी राहत बन सकती है, तो कुछ के लिए लंबे वर्किंग आवर्स चुनौती भी साबित हो सकते हैं। अब नजर इस बात पर रहेगी कि कंपनियां इस मॉडल को किस तरह अपनाती हैं और कर्मचारी इसे कितना स्वीकार करते हैं।
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