IBN24 News Network (Kajal Panchal)
क्या शादी के बाद महिला की सामाजिक पहचान भी नए राज्य के हिसाब से बदल जाती है? या फिर कानून के सामने जन्म से जुड़ी पहचान ही अंतिम सच रहती है? इसी सवाल पर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया कि विवाह के बाद दूसरे राज्य में बस जाने मात्र से किसी महिला को वहां की पिछड़ा वर्ग (बीसी) श्रेणी का लाभ नहीं मिल सकता।
जाति जन्म से तय होती है, स्थान परिवर्तन से नहीं
पूरा मामला राजस्थान मूल की एक महिला से जुड़ा है, जो शादी के बाद हरियाणा के रेवाड़ी में स्थायी रूप से रहने लगी थी। महिला ने हरियाणा सरकार से अपने बीसी-बी जाति प्रमाणपत्र के नवीनीकरण की मांग की थी। प्रशासन ने इस मांग को खारिज कर दिया, जिसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि चूंकि वह अब हरियाणा में स्थायी रूप से रह रही हैं, इसलिए उन्हें राज्य की बीसी-बी श्रेणी का लाभ मिलना चाहिए। साथ ही यह भी कहा गया कि उनके दावे को गलत तरीके से अस्वीकार किया गया है।
हालांकि राज्य सरकार ने इस तर्क का विरोध करते हुए कोर्ट को बताया कि 22 मार्च 2022 की अधिसूचना स्पष्ट रूप से यह तय करती है कि यदि कोई व्यक्ति एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरित होता है, तो वह केवल अपने मूल राज्य की जाति श्रेणी के आधार पर ही लाभ प्राप्त कर सकता है।
सरकार ने यह भी कहा कि विवाह या निवास बदलने से आरक्षण का आधार स्वतः नहीं बदल जाता। अधिसूचना के पैरा 3(4) के अनुसार किसी अन्य जाति या वर्ग में विवाह कर लेने मात्र से महिला की जातीय स्थिति में कोई कानूनी परिवर्तन नहीं होता।
डिवीजन बेंच फैसले का हवाला भी आया सामने
सुनवाई के दौरान अदालत ने अपने पूर्व के महत्वपूर्ण निर्णय हरियाणा लोक सेवा आयोग बनाम श्वेता कश्यप का उल्लेख किया। इसमें पहले ही यह स्पष्ट किया जा चुका है कि जाति व्यक्ति की जन्म आधारित पहचान है और विवाह के कारण उसमें कोई बदलाव नहीं आता।
हाई कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी
जस्टिस जगमोहन बंसल ने अपने फैसले में कहा कि आरक्षण व्यवस्था का आधार सामाजिक और जन्म आधारित संरचना है, जिसे केवल विवाह, निवास परिवर्तन या राज्य बदलने जैसे कारणों से बदला नहीं जा सकता।
अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता मूल रूप से राजस्थान की ओबीसी श्रेणी से संबंधित हैं, लेकिन हरियाणा में बसने के बाद वह वहां की बीसी-बी श्रेणी का लाभ लेने की पात्र नहीं हैं।
कानूनी सवाल फिर चर्चा में
इस फैसले ने एक बार फिर उस बहस को हवा दे दी है, जिसमें पूछा जाता है कि क्या विवाह के बाद महिला की कानूनी और सामाजिक पहचान नए राज्य के हिसाब से बदली जानी चाहिए या नहीं। अदालत ने हालांकि अपने निर्णय में यह स्पष्ट कर दिया कि आरक्षण का आधार केवल जन्म और मूल सामाजिक स्थिति ही रहेगी।
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