War Impact Reaches Cancer Patients : वैश्विक स्तर पर बढ़ते युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव का असर अब भारत के कैंसर मरीजों पर भी दिखाई देने लगा है। देशभर में कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दो महत्वपूर्ण कीमोथेरेपी दवाएं सिस्प्लैटिन (Cisplatin) और कार्बोप्लैटिन (Carboplatin) गंभीर शॉर्टेज का सामना कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो देश में कैंसर मरीजों के इलाज पर व्यापक असर पड़ सकता है।

Written by Kajal Panchal • Published on : 15 June 2026
IBN24 News Network : स्थिति इतनी गंभीर बताई जा रही है कि हर 100 में से करीब 70 मरीज किसी न किसी रूप में प्रभावित हो सकते हैं। कई अस्पतालों में मरीजों को दवा उपलब्ध नहीं होने के कारण इलाज टालना पड़ रहा है, जबकि कुछ मरीजों को बिना उपचार के ही वापस लौटाया जा रहा है।
कैंसर के इलाज की रीढ़ मानी जाती हैं ये दवाएं
सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन को दुनिया भर में कैंसर उपचार की सबसे प्रभावी और भरोसेमंद कीमोथेरेपी दवाओं में गिना जाता है। इनका उपयोग फेफड़ों के कैंसर, मुंह के कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, गर्भाशय कैंसर, ओवरी कैंसर, अंडकोष कैंसर समेत कई गंभीर प्रकार के कैंसरों के इलाज में किया जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ये दवाएं कई कैंसरों की फर्स्ट लाइन थेरेपी का हिस्सा हैं और लंबे समय से मरीजों को बेहतर परिणाम देने में अहम भूमिका निभाती रही हैं।
अस्पतालों से खाली हाथ लौट रहे मरीज
दवा संकट का असर अब सीधे मरीजों पर दिखाई देने लगा है। कई अस्पतालों में मरीजों को निर्धारित समय पर कीमोथेरेपी नहीं मिल पा रही है। इलाज में देरी होने से मरीजों और उनके परिवारों की चिंता बढ़ गई है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में इलाज का हर चरण बेहद महत्वपूर्ण होता है। यदि दवाएं समय पर उपलब्ध नहीं होतीं तो उपचार की प्रभावशीलता प्रभावित हो सकती है।
क्यों पैदा हुआ यह संकट ?
विशेषज्ञों के मुताबिक, सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन जैसी प्लैटिनम-बेस्ड दवाओं के निर्माण में उपयोग होने वाला कच्चा माल मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आता है। युद्ध, वैश्विक तनाव और सप्लाई चेन में आई रुकावटों के कारण इन दवाओं के उत्पादन पर असर पड़ा है।
दूसरी ओर, कच्चे माल और प्लैटिनम की कीमतों में लगातार वृद्धि से उत्पादन लागत भी काफी बढ़ गई है। सप्लाई प्रभावित होने और लागत बढ़ने के कारण कई कंपनियों ने उत्पादन घटा दिया, जिससे बाजार में दवाओं की उपलब्धता कम हो गई।
इलाज के तरीकों में बदलाव की मजबूरी
दवाओं की कमी के कारण कई अस्पतालों और कैंसर केंद्रों को उपचार की रणनीतियों में बदलाव करना पड़ रहा है। हालांकि कुछ वैकल्पिक दवाएं उपलब्ध हैं, लेकिन कई मामलों में सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन का कोई समान रूप से प्रभावी और किफायती विकल्प नहीं माना जाता।
यही वजह है कि विशेषज्ञ इस संकट को कैंसर उपचार व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती मान रहे हैं।
50% तक बढ़ सकती हैं कीमतें

यदि ऐसा होता है तो कैंसर मरीजों पर आर्थिक बोझ और बढ़ सकता है, खासकर उन परिवारों पर जो पहले से ही महंगे इलाज का खर्च उठा रहे हैं।
70% कीमोथेरेपी में होता है उपयोग
विशेषज्ञों का कहना है कि देश में होने वाली लगभग 70 प्रतिशत कीमोथेरेपी रेजिमेंस में सिस्प्लैटिन का उपयोग किया जाता है। यही कारण है कि इसकी कमी को सिर्फ एक दवा की शॉर्टेज नहीं, बल्कि पूरे कैंसर उपचार तंत्र के लिए खतरे के रूप में देखा जा रहा है।

क्या है आगे की चुनौती ?
स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि यदि सप्लाई चेन जल्द सामान्य नहीं हुई और उत्पादन नहीं बढ़ा, तो आने वाले महीनों में संकट और गहरा सकता है। ऐसे में सरकार, दवा कंपनियों और स्वास्थ्य संस्थानों को मिलकर इस समस्या का समाधान निकालना होगा ताकि कैंसर मरीजों को समय पर और प्रभावी इलाज मिल सके।
वैश्विक जंग और अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर अब सीधे कैंसर मरीजों तक पहुंच गया है। सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन जैसी जीवनरक्षक दवाओं की कमी ने हजारों परिवारों की चिंता बढ़ा दी है। यदि जल्द कदम नहीं उठाए गए तो इलाज में देरी, बढ़ती लागत और दवाओं की कमी आने वाले समय में कैंसर मरीजों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
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