बड़ा सवाल! आखिर मौत का ‘धंधा’ कब तक, कच्ची शराब पर कब खुलेगी सरकार की नींद

raw alcohol

के दतिया जिले से एक अजीबोगरीब खबर आई है. कच्ची शराब पी कर इंसान तो मरते ही रहते हैं, पर इस बार दतिया जिले में पांच आवारा गायों की कच्ची शराब पीने से मरने की खबर है. बताया गया है कि आबकारी टीम ने हजारों लीटर कच्ची शराब जब्त की जिसे ड्रम में भर कर रखा गया था.

उस शराब को उन्होंने वही जमीन पर बहा दिया जो गड्ढों में भर गया. लगभग 15 गायों ने उन गड्ढों से शराब पानी समझ कर पी ली. अभी तक पांच गायों के मरने की सूचना है और बाकी 10 पशुओं का अस्पताल में इलाज चल रहा है.

इस खबर से दो बड़े सवाल पैदा होते हैं, जिस पर विचार करें तो किसी को झकझोर देगा. पहली बात कहां से आती हैं ये आवारा गाएं और क्यों बनती है कच्ची शराब? दतिया में तो मासूम आवारा गायों के साथ यह घटना घटी जिन्हें शायद पानी और शराब में अंतर समझ में नहीं आया. अगर यही शराब इंसान पी लेते तो शायद मरने वालों की संख्या पिछले दिनों मध्य प्रदेश के ही मुरैना में मरे 24 व्यक्तियों से कहीं ज्यादा होती.

पशु भी सुरक्षित नहीं

पिछले साढ़े छह वर्षों से भारत को गायों पर फिर से प्यार आ गया है. गायों के तथाकथित तस्करों को घटनास्थल पर ही पीट-पीट कर मार दिया जाता है. गौ-सेवा के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करने का बजट है. अगर गौ माता है तो फिर वो आवारा क्यों है? बस यहीं करनी और कथनी में फर्क देखा जाता है. दिल्ली जैसे शहर में भी आवारा गाएं सड़क पर घूमती दिखती हैं. ये वो गाय होती है जो अब बच्चा पैदा नहीं कर सकती, दूध नहीं दे सकती.

हरियाणा में आवारा पशु किसानों के लिए बड़ी समस्या बन गए हैं. हरियाणा के किसान अब हल या बैलगाड़ी नहीं चलाते. सब कुछ ट्रैक्टर से होता है. गौ मांस के सेवन पर कुछ राज्यों को छोड़ कर पूरे देश में बैन लगा हुआ है. बैल और बूढ़ी गायों के लिए जीना दुश्वार है. बस दुधारू गाय और अच्छी नस्ल के सांड की ही जरूरत किसानों को है. जिसकी जरूरत नहीं होती उसे आज़ाद कर दिया जाता है.

भारत में शराब का कारोबार

पर भूख और प्यास तो सभी को लगती है, जानवरों को भी. लिहाजा ये पशु खेतों में प्रवेश कर जाते हैं और लाखों की खड़ी फसल बर्बाद हो जाती है. कमोबेश ऐसा ही नज़ारा पूरे देश में दिखता है. उन लाखों–करोड़ों की राशि से कुछ गौशालाओं का निर्माण होता है, जिनकी संख्या पर्याप्त नहीं होती और गौशालाएं भ्रष्टाचार का अड्डा बन गई हैं. सवाल है कि कच्ची शराब से भारत में ही क्यों हर वर्ष हजारों लोगों की मृत्यु होती है?

क्या कभी किसी ने कच्ची शराब से मौत की खबर पश्चिम जैसे विकसित या फिर अफ्रीका के अविकसित देशों से सुनी है? नहीं, क्योंकि वहां कच्ची शराब बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ती. वहां की सरकारें वास्तविकता को स्वीकारती हैं और सुरक्षित शराब जो हरेक तबके के लोग खरीद सकें, को बेचने की व्यवस्था करती हैं.

शराब के उत्पादन और बिक्री से कमाया पैसा सरकारी खजाने का बहुत बड़ा हिस्सा होता है. सरकारों को जब अतिरिक्त पैसा चाहिए तो सबसे पहले शराब की दर बढ़ा दी जाती है.

अमीर तो शायद फिर भी इसे सहन कर ले, गरीब जो दिन भर की थकान शराब द्वारा दूर करना चाहते हैं पर पैसों की कमी होती है- वे कच्ची शराब के अड्डे पर चले जाते हैं. कच्ची शराब कहां बनती है, कहां बिकती है, कौन बनाता है, कौन बेचता है- इसकी जानकारी एक्साइज विभाग, पुलिस और स्थानीय प्रशासन को होती है. उनके संरक्षण में ही सब कुछ होता है और उनकी जेबें भरती हैं.

गरीबों के जीवन से खिलवाड़

चूंकि कच्ची शराब की भट्टियों में केमिकल इंजीनियर नहीं होता और क्वालिटी की जांच होती नहीं है, पैसों के लालच में शराब बनाने के प्रक्रिया ज़ल्दी पूरी कर दी जाती है या फिर कभी-कभी गलत कच्चा माल इस्तेमाल हो जाता है जिससे कच्ची शराब ज़हरीली बन जाती है. लिहाजा पीने वालों की मौत हो जाती है. राज्य सरकार हो या स्थानीय प्रशासन, ऐसी घटनाओं को छुपाने और दबाने की ही कोशिश में लगे होते हैं, ताकि उनकी पोल न खुल जाए और आमदनी का रास्ता न बंद हो जाए.

शायद ही कभी किसी ने सुना हो कि कच्ची शराब की भट्टी के मालिक को गिरफ्तार किया गया हो या उसे सजा मिली हो. चूंकि मरने वाले गरीब तबके के लोग होते हैं, सरकार और समाज इसकी परवाह नहीं करते. गरीब लोगों के जीवन पर यह व्यापार चलता रहता है.

कार्रवाई करें सरकारें

समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें सच्चाई का सामना करें. सच्चाई यही है कि भारत में बड़ी मात्रा में लोग शराब पीते हैं. सरकारों का काम होता है कि उन्हें शराब पीने से होने वाले नुकसान के बारे बताया जाए, और फिर भी जो पीना चाहे उसे उचित दर पर और सुरक्षित शराब मुहैया कराई जाए.

विदेशों में शराब पर इतना ज्यादा कर नहीं होता है जितना कि भारत में. वहां शराब सस्ती मिलती है, खासकर बीयर और वाइन जिसमें नशा कम होता है. लिहाजा किसी को गैरकानूनी तरीके से शराब बनाने और पीने की जरूरत नहीं पड़ती.

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