यह स्कूल 65 गांवों से 1600 लड़कियों को फ्री शिक्षा दे रहा है, स्कूल आने पर रोज 10 रु भी देता है

‘परदादा-परदादी’ एक अनोखा स्कूल है, जिसका नाम भी अनोखा है. यहां लड़कियों को मुफ्त भोजन और क्लासेज यानी मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाती है. यही नहीं यहां स्कूल आने पर स्टूडेंट को रोज 10 रुपए भी दिए जाते हैं.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यहां कक्षा 12 तक सब कुछ मुफ्त है और उस स्कूल में 65 गाँवों से लगभग 1600 लड़कियां पढ़ रही हैं. इसके अलावा, 17 बसों का उपयोग लड़कियों को गांव से गांव तक ले जाने के लिए किया जाता है. यह स्कूल यूपी के बुलंदशहर में पड़ने वाले अनूपशहर में है. इसे शुरू करने वाले शख्स का नाम वीरेंद्र सिंह है. वो 60 साल के हैं. अमेरिका में नौकरी से रिटायर होने के बाद वो वापस आ गए.

वीरेंद्र ने कहते हैं, ‘मैंने जब इतना कुछ हासिल कर लिया था तो अमरीका में मेरे कई विदेशी मित्र मुझसे अक्सर कहते थे कि भारत को तुम जैसे लोगों कि ज्यादा जरूरत है और तुम्हें वहां वापस जाकर कुछ करना चाहिए. उनकी बातें सही भी थीं. जब मैं वापस अनूपशहर आया तो मुझे एहसास हुआ कि यहां बहुत कुछ करने की गुंजाइश है और यह करना बेहद जरूरी भी है.”

मीडिया से बात करते हुए वो आगे कहते हैं, ‘एक घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया था. मैंने देखा कि गांव की बच्ची, जिसकी उम्र बमुश्किल 12-13 साल रही होगी, उसकी सलवार में कुछ खून लगा था. ये देखकर उस बच्ची की चाची ने उसकी मां से कहा कि बेटी अब जवान हो गई है और इसकी शादी की उम्र आ गई है. यही पैमाना बच्चियों की शादी करवा देने का होता था. तब मैंने मन बनाया कि मुझे गांव की इन बच्चियों के लिए कुछ करना है.”

हालांकि, शुरू में यह लोगों को समझाना आसान नहीं था. उन्होंने कहा, “उस दौर में सभी लोग हम पर शक करते थे. लोगों को लगता था कि विदेश से कोई पैसे वाला आया है, दो-चार दिन हमसे वादे करेगा और फिर लौट जाएगा, लेकिन हमने गांव वालों को समझाया कि हम आपसे कोई फीस नहीं मांग रहे, आप एक-दो महीने अपने बच्चों को भेजकर देखिए फिर भी अगर आपको ठीक न लगे तो आगे से मत भेजिएगा.”

जोश के मुताबिक, “स्कूल में हर बच्चे की पढ़ाई पर औसतन 39 हजार रुपए सालाना खर्च होता है. यह पैसा अधिकतर अप्रवासी भारतीय देते हैं, जिन्होंने इन बच्चों की शिक्षा का जिम्मा उठाया है. 12वीं तक के बच्चों के लिए सब कुछ मुफ्त है, लेकिन उसके आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को खुद भी कुछ जिम्मेदारी लेनी होती है. स्कूल अच्छा कर रहा है और साथ ही राजनीतिक नेताओं का भी भरपूर सहयोग मिल रहा है. हमें इस तरह के और संस्थानों की जरूरत है. यह पहल एक सपने के साथ शुरू हुई और अब यह एक वास्तविकता है.”

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