देश के यें 12 गांव पूरी तरह से हैं आत्मनिर्भर, सिर्फ़ नमक खरीदते हैं

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सतपुड़ा का जंगल. जगह का नाम पातालकोट. 12 गांव. कहा जाता है कि यहां एक ऐसा आदिवासी समाज रहता है, जो हर मायने में आत्मनिर्भर है. यह समाज सिर्फ नमक खरीदने के लिए गांव से बाहर आता है.

छिंदवाड़ा जिले से 78 किमी दूर सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच जंगल हैं. यहीं 17 फीट नीचे बसा है पातालकोट. यहा 79 वर्ग किमी के दायरे में फैला है. यहां के 12 गांवों में भारिया आदिवासी समाज रहता है. यहां रहने वाले अपने आप में इतने आत्मनिर्भर हैं कि सिर्फ नमक खरीदने  के लिए बाहर आते हैं.

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कहा जाता है कि पहले पातालकोट पहुंचने के लिए लड़क नहीं थी. लोग पहाड़ पर उगे लताओं और पेड़ों की जड़ों को पकड़कर ऊपर आते थे. पगडंडियां ही उनका रास्ता थीं. लेकिन, अब वहां सड़क पहुंच गई है. यहां के लोगों को कोई बीमारी होती है तो वह जंगल से प्राप्त जड़ी बूटियों से ही इलाज करते हैं.

इसके जंगल में ढाक, आचार, महुआ, आंवला और चिरौंजी के पेड़ भरे पड़े हैं. कहा जाता है कि ऊपर से देखने पर पाताललोक घोड़े की नाल जैसा दिखता है. यहां के घर मिट्टी से लिपे होते हैं. छत खपरैल के बने होते हैं. यहां लोग जंगल में उपजी चीजों को ही खाते हैं. वे सिर्फ नमक बाहर से खरीदते हैं.

यहां के लोग जंगलों को अपने होने का कारक मानते हैं. ऐसे में वे जंगल से उतना ही लेते हैं, जितना वापस कर सकें. घरों में सिर्फ जरूरत का सामान रखते हैं. हर घर के पास एक खेत है जहां वे जरूरत भर का अनाज और सब्जी  उगा लेते हैं. वे हरे पेड़ पर कुल्हाड़ी नहीं मारते हैं, बल्कि गिरे हए पेड़ को ही काटकर उपयोग में लाते हैं.

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