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Mamta Souda Everest Journey : 16 साल पहले आज के दिन हरियाणा की बेटी ममता सौदा ने माउंट एवरेस्ट पर फहराया था तिरंगा, जानिए साधारण परिवार से निकलकर कैसे पहुंची दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक…

Mamta Souda Everest Journey

Mamta Souda Everest Journey

Mamta Souda Everest Journey : 22 मई 2010… यह तारीख हरियाणा और देश के पर्वतारोहण इतिहास में हमेशा याद की जाती है। इसी दिन हरियाणा के कैथल जिले की बेटी Mamta Souda ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट फतह कर तिरंगा झंडा लहराया था।

Mamta Souda Everest Journey

Written by Kajal Panchal • Published on : 22 May 2026

IBN24 News Network : आज उस ऐतिहासिक उपलब्धि को 16 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन ममता सौदा का संघर्ष, साहस और सफलता आज भी युवाओं, खासकर बेटियों के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। वर्तमान में वे हरियाणा पुलिस मुख्यालय पंचकूला में DSP Law & Order के पद पर तैनात हैं।

साधारण परिवार से निकलकर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक पहुंचीं

1 नवंबर 1979 को हरियाणा के कैथल में जन्मीं ममता सौदा का सफर आसान नहीं था। वे एक साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से आती हैं। उनके पिता लक्ष्मण दास सौदा हरियाणा खाद्य एवं आपूर्ति विभाग में इंस्पेक्टर थे, लेकिन 2004 में उनके निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी मां मेवा देवी पर आ गई।

कठिन परिस्थितियों के बावजूद ममता ने अपने सपनों को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उन्होंने कैथल के स्थानीय स्कूल से पढ़ाई की और बाद में RKSD कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से M.P.Ed और M.Phil की पढ़ाई पूरी की। बाद में वे शहीद बाबा दीप सिंह कॉलेज ऑफ फिजिकल एजुकेशन में लेक्चरर भी रहीं।

खेल मैदान से शुरू हुआ संघर्ष

Mamta Souda Everest Journey

ममता सौदा केवल पर्वतारोही ही नहीं बल्कि बेहतरीन हैंडबॉल खिलाड़ी भी रहीं। 1998 जूनियर नेशनल हैंडबॉल चैंपियनशिप में वे उपविजेता टीम का हिस्सा थीं। इसके अलावा कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी की ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी विजेता टीम में भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया।

हरियाणा खेल एवं युवा कल्याण विभाग ने वर्ष 2003 में उन्हें हैंडबॉल में ‘B-One Grade Sportswoman’ घोषित किया था। खेलों में अनुशासन और फिटनेस ने ही आगे चलकर उन्हें पर्वतारोहण में नई पहचान दिलाई।

पिता के सपने ने बनाया पर्वतारोही

ममता को बचपन से ही पहाड़ों और एडवेंचर का शौक था। उनके पिता उन्हें हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। यही वजह रही कि उन्होंने उत्तरकाशी स्थित नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग से पर्वतारोहण की ट्रेनिंग ली।

इसके बाद उन्होंने लगातार कठिन चोटियों पर चढ़ाई शुरू की। वर्ष 2008 में वे IMF Golden Jubilee Expedition Team का हिस्सा बनीं और फवारंग पीक पर सफल आरोहण किया। इसके बाद मून पीक और श्रीकांत पीक जैसी कठिन चोटियों पर भी उन्होंने सफलता हासिल की।

18 लाख का खर्च… लेकिन हौसला नहीं टूटा

माउंट एवरेस्ट अभियान आसान नहीं था। इस मिशन के लिए करीब 18 लाख रुपये की जरूरत थी। ममता ने अलग-अलग संस्थाओं और लोगों की मदद से यह राशि जुटाई। हरियाणा सरकार, नवीन जिंदल और कई अन्य लोगों ने उनके अभियान को समर्थन दिया।

उनके अभियान को भारत की पहली महिला एवरेस्ट विजेता बछेंद्री पाल और संतोष यादव का भी प्रोत्साहन मिला। टीम में भारत सहित कई देशों के पर्वतारोही शामिल थे और अभियान का नेतृत्व प्रसिद्ध आप्पा शेर्पा कर रहे थे, जिन्होंने एवरेस्ट पर कई बार चढ़ाई का रिकॉर्ड बनाया था।

22 मई 2010 : जब एवरेस्ट पर लहराया तिरंगा

Mamta Souda Everest Journey

करीब 40 दिनों तक खुम्बू ग्लेशियर और अलग-अलग कैंपों में रुकते हुए टीम ने एवरेस्ट की चढ़ाई पूरी की। आखिरकार 22 मई 2010 की सुबह 10:24 बजे ममता सौदा ने माउंट एवरेस्ट की चोटी पर कदम रखा और वहां तिरंगा फहराया।

यह पल केवल उनकी व्यक्तिगत सफलता नहीं बल्कि पूरे हरियाणा और देश के लिए गर्व का क्षण बन गया। एवरेस्ट फतह करने के बाद हरियाणा सरकार ने उन्हें पुलिस सेवा में शामिल किया और वे बाद में DSP बनीं।

पांच महाद्वीपों की ऊंची चोटियों पर फहराया तिरंगा

ममता सौदा का सपना केवल एवरेस्ट तक सीमित नहीं था। उन्होंने दुनिया के सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों पर चढ़ने का लक्ष्य बनाया। अब तक वे एशिया, अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका और ओशिनिया की सबसे ऊंची चोटियों पर तिरंगा फहरा चुकी हैं।

उनकी उपलब्धियों में माउंट एल्ब्रुस, किलिमंजारो और ओशिनिया की खतरनाक कारस्टेंसज पिरामिड जैसी चोटियां शामिल हैं।

जब पूरी दुनिया होली मना रही थी, तब ममता मौत से लड़ रही थीं

ओशिनिया की सबसे ऊंची चोटी कारस्टेंसज पिरामिड पर चढ़ाई उनके सबसे कठिन अभियानों में शामिल रही। इंडोनेशिया के पश्चिमी पापुआ क्षेत्र में स्थित यह चोटी बेहद खतरनाक मानी जाती है।

माइनस 5 डिग्री तापमान, लगातार बारिश, 22 फीट लंबी रस्सियां और गहरी खाइयों के बीच चढ़ाई करना आसान नहीं था। कई जगह केवल लोहे की वायर और रस्सियों के सहारे आगे बढ़ना पड़ा। लेकिन ममता का आत्मविश्वास और हौसला उन्हें लगातार आगे बढ़ाता रहा।

पद्मश्री से सम्मानित हुईं

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पर्वतारोहण में शानदार योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2014 में ममता सौदा को देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया। वे हरियाणा की पहली सिविलियन महिला पर्वतारोही मानी जाती हैं जिन्होंने माउंट एवरेस्ट फतह कर प्रदेश का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया।

बेटियों के लिए उम्मीद की नई पहचान

आज ममता सौदा सिर्फ एक पर्वतारोही नहीं बल्कि संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास की पहचान बन चुकी हैं। छोटे शहर और सीमित संसाधनों से निकलकर दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों तक पहुंचने वाली उनकी कहानी हर उस युवा को प्रेरित करती है जो अपने सपनों को सच करना चाहता है।

ममता अक्सर कहती हैं कि पहाड़ सिर्फ ऊंचाई नहीं सिखाते, बल्कि हर मुश्किल परिस्थिति में डटे रहना भी सिखाते हैं। शायद यही वजह है कि 16 साल बाद भी उनका नाम हरियाणा की सबसे प्रेरणादायक बेटियों में लिया जाता है।

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