महाशयां दी हट्टी को देश का टॉप मसाला ब्रांड बनाने वाले महाशय धरमपाल गुलाटी की कहानी

किसी भी घर का दिल होता है उसका किचन. घर के लोग कितने खुश और स्वस्थ हैं ये किचन के हाल पर ही निर्भर करता है. रसोई से आ रही पक रहे खाने की खुशबू से इंसान की दिन भर की थकान उतर जाती है. ये खुशबू आती है सब्जी दाल में पड़े मसालों से. और जब मसालों की बात चली है फिर हम कैसे खुद को कहने से रोक सकते हैं ‘असली मसाले सच सच, एमडीएच एमडीएच.’ और जब बात एमडीएच की हो फिर भला हम मसाला किंग को कैसे भूल सकते हैं. आज हम बात करेंगे उस शख्स की जिसने अपनी आजीविका चलाने के लिए कई तरह के काम किए लेकिन फिर अपनी मेहनत और सूझबूझ से पक्की कर ली भारत की हर रसोई में अपनी जगह.

पाकिस्तान से शुरू हुई कहानी!


ये कहानी शुरू होती है पाकिस्तान के सियालकोट से. एमडीएच का मसाला ब्रांड पाकिस्तान के इसी शहर से शुरू हुआ और इसे शुरू करने वाले थे महाशय चुन्नीलाल गुलाटी. एमडीएच मतलब महाशयां दी हट्टी (महाशयों की दुकान). 1919 में चुन्नी लाल ने इसी नाम से मसालों की दुकान शुरू की थी. 1923 में चुन्नीलाल और चननदेवी को एक बेटा हुआ. जिसका नाम रखा गया धरमपाल. पूरा नाम महाशय धरमपाल गुलाटी.

धरमपाल मस्त मौला बच्चा था, एक पढ़ाई को छोड़ कर बाक़ी सब कामों में उसका मन लगता. वो नदी किनारे भैंस की पीठ पर बैठ कर उसकी चरवाही करता, अखाड़े में वर्जिश करने के साथ साथ कुश्ती खेला करता, अपने पिता के साथ उनके काम में हाथ बंटाता लेकिन स्कूल जाने से कतराता रहता. चुन्नीलाल चाहते थे कि उनका बेटा खूब पढ़े, नौकरी करे बड़ा आदमी बने लेकिन धरम के लक्षण ऐसे बिल्कुल नहीं थे.

पिता को भी ये बात तब समझ आ गई जब धरमपाल ने पांचवीं के बाद पढ़ने से मना कर दिया. चुन्नीलाल ने उन्हें बढ़ई का काम सीखने लगा दिया लेकिन धरम का मन यहां भी ना लगा. तब किसे पता था कि उनकी किस्मत पढ़ने या बढ़ई का काम सीखने से नहीं बल्कि इन मसालों से बनेगी जिसकी दुकान उनके पिता ने खोल रखी है. कुछ समय हर तरह के काम सीखने की कोशिश करने के बाद अंत में वह अपने पिता के व्यापार में ही हाथ बंटाने लगा.

बेटे के साथ आ जाने से चुन्नीलाल का काम पहले से बेहतर हो गया था. अब उन्हें देगी मिर्च वाले के नाम से जाना जाने लगा. सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था. इतने ज़्यादा पैसे नहीं थे तो कोई तंगहाली भी नहीं थी. मगर जो अब होने वाला था वो उससे चुन्नीलाल का परिवार तंगहाली में जाने वाला था. भारत के आज़ाद होने के पहले से बातें तो हर जगह उड़ रही थीं बँटवारे की लेकिन सब समझ रहे थे कि ये बस अफवाह है.

फिर अचानक से ये अफवाह सच हो गई. एकदम से ही लाखों लोगों को बेघर कर उनकी जन्मभूमि से भागने पर मजबूर कर दिया गया. 7 सितंबर 1947 को चुन्नीलाल भी अपने परिवार के साथ जैसे तैसे अमृतसर के रिफ्यूजी कैंप में पहुंच गये. अब सबकुछ नए सिरे से शुरू करना था. रिफ्यूजी कैंप की ज़िंदगी ऐसे भयानक सपने जैसी थी, जिसे इससे पहले देखने की किसी ने हिम्मत तक नहीं की थी. लेकिन धरमपाल ठहरे मस्तमौला आदमी और मस्तमौला होने का एक बड़ा फायदा यह है कि ऐसे इंसान परेशानी को नहीं देखते बल्कि उससे निकलने का रास्ता खोजते हैं. धरमपाल ने भी यही किया.

खर्च चलाने के लिए तांगा तक चलाया

अमृतसर बॉर्डर एरिया था. उन दिनों यहां दंगों का खतरा सबसे ज़्यादा था. धरमपाल नहीं चाहते थे कि वह कोई काम शुरू करें और वो फिर से उन्माद की भेंट चढ़ जाए. इसके अलावा तब दिल्ली पंजाब के मुकाबले सस्ता था. यही सब सोच कर 23 साल के धरमपाल अपने बहनोई के साथ दिल्ली चले गये, लेकिन समस्या थी कि अब किया क्या जाए. पैसे कुछ खास थे नहीं उनके पास. उनके पिता ने दिल्ली आने से पहले उन्हें 1500 रुपये दिए थे.

यही पूंजी थी उनकी. इसी में से 650 रुपये में धरमपाल ने एक तांगा खरीदा. उन दिनों आने जाने के लिए मैट्रो तो छोड़िये आम बसें भी इतनी ज़्यादा नहीं थीं. धरमपाल का तांगा दिल्ली स्टेशन, कुतुब रोड और करोल बाग के बीच दौड़ने लगा. कुछ समय तो ये धंधा सही चला लेकिन जल्दी ही धरमपाल ये समझ गये कि इससे वो कुछ ज़्यादा नहीं कमा सकते. इसी के बाद से उनका दिमाग किसी और धंधे को खोजने में लग गया.

थक हार कर उन्हें खयाल आया अपने पिता द्वारा शुरू किए गये मसालों के व्यापार का. बस यहीं से उन्होंने सफलता की तरफ जाने वाली राह पकड़ी. तांगा बेच दिया और एक लकड़ी का खोखा बनवाया जिसे उन्होंने करोल बाग में अजमल खान रोड पर लगा दिया. अपनी इस मसालों की दुकान को धरमपाल ने नाम दिया “महाशयां दी हट्टी ऑफ़ सियालकोट, देगी मिर्च वाले. अपने इस नए काम को आगे बढ़ाने में धरमपाल और उनके छोटे भाई सतपाल ने अपनी पूरी जान लगा दी.

कुछ ही सालों में दोनों की मेहनत रंग दिखाने लगी. अब आस पास के इलाकों में हर किसी की ज़ुबान पर एमडीएच का नाम था. बढ़ते काम को देखते हुए धरमपाल ने दिल्ली के अन्य इलाकों में भी अपनी दुकानें लगानी शुरू कर दीं. अब लकड़ी के खोखों और आम दुकानों से आगे बढ़ने का समय था. यही सोच कर धरमपाल ने मॉडर्न स्पाइस स्टोर खोलने का मन बनाया.

दिल्ली में अभी तक मसालों की ऐसी दुकान नहीं थी. 1953 में धरमपाल ऐसे फैंसी स्टोर की बनावट देखने बंबई पहुंच गये. यहां से लौटने के बाद धरमपाल ने दिल्ली में पहला मॉडर्न स्पाइस स्टोर खोला. एक पांचवीं पास व्यक्ति के लिए ये सब सोचना और उसे अपने व्यापार में लागू करना ये सिद्ध करता है कि अनुभव पढ़ाई से कहीं ज़्यादा कारगर साबित होता है.

शुद्धता के कारण मिली सफलता

कड़ी मेहनत और सूझबूझ के अलावा जिस खास बात ने धरमपाल के काम को बुलंदियों तक पहुंचाया वो थी शुद्धता. धरमपाल खास तौर पर इस बात का ध्यान रखते कि उनके मसालों में किसी तरह की मिलावट ना हो पाए. वो एमडीएच मसाले ही थे जिसने इस भ्रम को तोड़ा कि घर में कूटे गये मसाले ही शुद्ध होते हैं. मसालों के अन्य व्यापारी भी थे लेकिन धरमपाल सबको पीछे छोड़ते गये.

उन्होंने इसकी पैकिंग को लेकर भी एक नई शुरुआत की. पहले मसाले जहां पन्नी में पैक होते थे वहीं एमडीएच मसालों को गत्ते के पैकेट में बेचा जाने लगा. इस पर चुन्नीलाल और धरमपाल की तस्वीर लगने लगी और इसके साथ ही ये स्लोगन भी लगने लगा ‘हाइजीनिक, फुल ऑफ़ कलर, एंड टेस्टी. एमडीएच में तैयार होने वाले मसालों के लिए कच्चा माल केरला कर्नाटक अफ़ग़ानिस्तान और ईरान से आता है.

इसके अलावा इनकी शुद्धता टेस्ट करने के लिए मशीनें लगाई गई हैं. एमडीएच हर रोज़ लगभग 30 टन मसालों का उत्पादन करता है. एमडीएच के बारे में आज कौन नहीं जानता. ये महाशय धरमपाल गुलाटी की मेहनत ही है कि आज ये मसाला ब्रांड देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी प्रचलित है. मीट मसाला, देगी मिर्च, कसूरी मेथी और ऐसे अन्य मसालों सहित एमडीएच 60 से ज़्यादा मसालों का उत्पादन करता है.

2017 में इस कंपनी की कीमत 924 करोड़ आंकी गई थी. ये कंपनी 100 से ज़्यादा देशों में अपने मसालों का निर्यात करती है. इसके अलावा इसके 8 लाख से ज़्यादा रिटेल डीलर हैं तथा 1000 से ज़्यादा होलसेलर हैं. बढ़ई का काम सीखने से लेकर तांगा चलाने के बाद मात्र 1000 रुपये से शुरू किए गये व्यापार को अपनी सुझबूझ और मेहनत से पांचवीं तक पढ़े महाशय धरमपाल गुलाटी ने कामयाबी की बुलंदियों तक पहुंचा दिया है.

97 साल के धरमपाल इस कंपनी के मालिक और सीईओ हैं. इतनी उम्र हो जाने के बावजूद भी धरमपाल खुद को बूढ़ा नहीं मानते तथा नियमित रूप से अपनी फ़ैक्टरियों का दौर करते हैं. आज भी कंपनी के सारे फैसले धरमपाल ही लेते हैं. अपनी इस मेहनत के लिए धरमपाल राष्ट्रपति के हाथों पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किए जा चुके हैं.

भावुक हैं और दिल से अमीर भी

कहते हैं जिसने तंगियां काटी होती हैं, वो दूसरों का दुख बहुत अच्छे से महसूस कर सकता है. धरमपाल जी इस बात को एकदम सही सिद्ध करते हैं. वे जितने भावुक हैं उनका दिल भी उतना ही बड़ा है. आप किसी की मदद के लिए उसे क्या दे सकते हैं, अपनी कमाई का कुछ हिस्सा ही ना ? लेकिन आपको जान कर हैरानी होगी कि धरमपाल अपनी तन्ख्वाह का 90% हिस्सा दान में देते हैं.

इसके अलावा इन्होंने एक संस्था भी बनाई है जिसका नाम अपने पिता के नाम पर रखा है. यह संस्था 250 बेड का हॉस्पिटल चलाती है जहां गरीब और असहाय लोगों का मुफ्त इलाज होता है. साथ ही साथ इस संस्था ने चार स्कूल भी खोले हैं जहां ज़रूरतमंद बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाती है. कोरोना काल में भी धरमपाल मदद करने से पीछे नहीं हटे. अभी हाल ही में धरमपाल द्वारा दिल्ली सरकार को 7500 पीपीई किट्स की सहायता की गई.

इसकी जानकारी मनीष सिसोडिया ने ट्वीटर पर दी थी. इसके साथ इन्होंने सीएम रिलीफ फंड में भी धनराशि जमा कर के आर्थिक मदद की. धरमपाल जी की भावुकता देश के सामने तब आई थी जब पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के निधन पर धरमपाल उनके अंतिम दर्शन करने पहुंचे थे. इस दौरान वह सुषमा जी के पैरों के पास बैठ कर उनके सम्मान में ज़ोर ज़ोर से रोने लगे थे. इस दृश्य ने सबको भावुक कर दिया था.

तो ये थी एमडीएच के कर्ताधर्ता महाशय धरमपाल गुलाटी जी की कामयाबी की कहानी. ऐसे लोग हमें बताते हैं कि हम अपनी मेहनत से अपने भविष्य को बदल सकते हैं. आज हम एक काम शुरू करते हैं और उसके कामयाब ना होने पर हार जाते हैं जबकि जीवन तो हर रोज़ नए मौके देती है. आप भी इन मौकों को पहचानिए और धरमपाल जी की तरह पूरे मन से मेहनत करते रहिए. आप निश्चित एक दिन सफलता को पा लेंगे.

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