Higher Education Inspection Dispute : हरियाणा के उच्च शिक्षा विभाग ने राज्य के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के औपचारिक निरीक्षण के लिए गठित कमेटी को लेकर जारी आदेश वापस ले लिया है। विभाग की ओर से जारी नए पत्र में साफ किया गया है कि 21 अप्रैल 2026 को जारी कमेटी गठन संबंधी आदेश तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिए गए हैं।
Written by Kajal Panchal • Published on : 21 May 2026
IBN24 News Network : यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब कमेटी में शामिल कुछ सदस्यों की योग्यता और चयन प्रक्रिया को लेकर शिक्षाविदों और प्रोफेसरों के बीच लगातार सवाल उठ रहे थे। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर बहस तेज हो गई थी।
अप्रैल में बनाई गई थी निरीक्षण कमेटी
कमेटी को राज्य के सभी सरकारी कॉलेजों, सहायता प्राप्त कॉलेजों, सेल्फ फाइनेंसिंग संस्थानों और विश्वविद्यालयों का औपचारिक निरीक्षण करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
PA की नियुक्ति पर उठा विवाद
कमेटी में शिक्षा मंत्री के पीए प्रदीप जागलान को शामिल किए जाने को लेकर सबसे ज्यादा विवाद हुआ। कई प्रोफेसरों और शिक्षा विभाग से जुड़े लोगों ने सवाल उठाया कि निरीक्षण जैसी तकनीकी और अकादमिक प्रक्रिया में उनकी विशेषज्ञता क्या है।
सोशल मीडिया पर शिक्षकों ने यह भी सवाल किया कि जब विभाग में कई वरिष्ठ अधिकारी और शिक्षा विशेषज्ञ मौजूद हैं, तब किसी प्रशासनिक सहायक को इतनी अहम कमेटी में शामिल करने का आधार क्या था।
विरोध बढ़ने के बाद विभाग पर दबाव बना और आखिरकार सरकार ने पूरा आदेश ही वापस ले लिया।
क्या था कमेटी का उद्देश्य ?
विभागीय आदेश के मुताबिक, कमेटी का मकसद कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में उपलब्ध बुनियादी ढांचे, शिक्षण गुणवत्ता, प्रशासनिक व्यवस्था और अन्य सुविधाओं की समीक्षा करना था। निरीक्षण के आधार पर संस्थानों में सुधार की दिशा तय की जानी थी।
हालांकि, कमेटी की संरचना को लेकर विवाद शुरू होने के बाद यह पहल सवालों के घेरे में आ गई।
सभी संस्थानों को भेजा गया नया आदेश
उच्च शिक्षा विभाग ने नया आदेश जारी करते हुए सभी विश्वविद्यालयों के रजिस्ट्रार और कॉलेज प्राचार्यों को सूचित किया है कि पूर्व में जारी निरीक्षण कमेटी संबंधी आदेश अब प्रभावी नहीं रहेगा। साथ ही विभाग ने निर्देशों की अनुपालना सुनिश्चित करने को भी कहा है।
शिक्षा व्यवस्था पर फिर उठे सवाल
इस पूरे मामले ने हरियाणा के उच्च शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। शिक्षकों का कहना है कि अकादमिक निरीक्षण जैसी गंभीर प्रक्रिया में पारदर्शिता और विशेषज्ञता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, ताकि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता बनी रहे।
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