जींस-टॉप वाली नार्थ ईस्ट की बहुओं का हरियाणा में बदल गया अंदाज, पढ़ें- दो संस्कृतियों के मिलन की कहानी

हिसार। हरियाणा के हिसार शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित है गांव जुगलान। इस गांव में पांच परदेसी बहुएं हैं। इनमें अधिकतर त्रिपुरा से आई हैं। सगी बहनों फूलपरी और मोहनी की शादी एक ही घर में दो भाइयों सुनील और लाखन से हुई है। यह शादी सिर्फ जोड़ों का मिलन नहीं, बल्कि दो प्रदेशों और संस्कृतियों का मिलन भी है।

जुगलान गांव के सुनील सिंह 19 साल पहले अपने दोस्त के साथ त्रिपुरा स्थित उसकी ससुराल गए थे, लेकिन वहां से लौटे तो 12वीं पास 18 साल की फूलपरी के साथ। गांव आकर घरवालों ने दोनों की फिर से हरियाणवीं रीति-रिवाजों से शादी कराई। फूलपरी की शादी के एक साल बाद उसकी बहन मोहिनी की शादी देवर लाखन से हो गई। दोनों बहनें अब पूरी तरह से हरियाणवी रंग-ढंग में ढल चुकी हैं। बोली-भाषा के साथ-साथ खान-पान, पहनावा और काम करने का ढंग ठेठ हरियाणवी है। दो बेटों की मां फूलपरी के पति सुनील सिंह की कुछ माह पहले हार्ट अटैक से मौत हो गई थी।

घूंघट की तो अब आदत हो गई : शादी से पहले मायके में जींस-शर्ट या मिडी-टॉप पहनने वाली फूलपरी और मोहिनी का पहनावा भी शादी के बाद बदल गया। सलवार सूट के साथ घूंघट भी उनके पहनावे में शुमार हो गया। पास में ही चारा काट रही मोहिनी बताती हैं कि शुरुआत में उन्हें घूंघट में काफी दिक्कत होती थी। घूंघट हट जाता तो शर्म भी आती थी, लेकिन मेरी सास ने कभी टोका भी नहीं। वैसे भी अब तो घूंघट की आदत हो गई है। मोहिनी बताती हैं, ‘शुरुआती दिनों में मेरा जुगलान में मन बिल्कुल नहीं लगता था। क्योंकि मैं पहाड़ों की ठंडी हवा-पानी की आदी थी और यहां का मौसम बिल्कुल उलट था। त्रिपुरा हमारी जन्मभूमि है उससे प्यार स्वाभाविक है लेकिन हमें अब यहीं अच्छा लगने लगा है।’

टूट रही विश्वास की डोर, कुछ लोगों ने की छवि खराब : मोहिनी बताती हैं कि पिछले सात-आठ साल से त्रिपुरा के लोग हरियाणा में शादी करने से बच रहे हैं। इसका कारण है हरियाणा के कुछ लोगों द्वारा उनका विश्वास तोड़ना। फूलपरी कहती हैं कि हमारे माता-पिता विश्वास पर ही सैकड़ों किलोमीटर दूर अपनी बेटी की शादी करते हैं, लेकिन यहां जब उनके साथ शराब पीकर मारपीट की जाती है। शारीरिक शोषण किया जाता है तो वह विश्वास की डोर टूट जाती है।

जैसे ही कोई घर पहुंचता है तो लाखन सिंह का बेटा रुद्रा हुक्के से उनका स्वागत करता है। 10वीं पास 17 साल के रुद्रा ने बताया कि करीब चार साल पहले वह ननिहाल गया था, लेकिन उसे त्रिपुरा की पहाड़ियों और नदियों से ज्यादा अच्छा अपने गांव का जोहड़ और खेत लगते हैं। बोली भी वह ठेठ हरियाणवीं बोलता है।

सिर्फ चेहरे से दिखता है अंतर : फूलपरी, मोहिनी या उनके बच्चे सभी के नैन-नक्श पहाड़ी क्षेत्र से मिलते हैं। बस यही एक अंतर है जो उनको हरियाणा के लोगों से अलग दिखाता है। हुक्के से स्वागत जैसे ही कोई घर पहुंचता है, लाखन सिंह का बेटा रुद्रा हुक्के से स्वागत करता है। 10वीं पास 17 साल के रुद्रा ने बताया कि करीब चार साल पहले वह ननिहाल गया था, लेकिन उसे त्रिपुरा की पहाड़ियों और नदियों से ज्यादा अच्छा गांव का जोहड़ और अपने खेत लगते हैं।

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