Haryana HR Number Relief : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा के हजारों वाहन मालिकों को बड़ी राहत देते हुए राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत पुराने वाहन नंबरों को नई HR सीरीज में बदलवाने पर शुल्क लिया जा रहा था। अदालत ने साफ कहा है कि पहले से आवंटित नंबरों को नई सीरीज में बदलने के लिए दोबारा फीस नहीं ली जा सकती, चाहे वह नंबर वीआईपी या पसंदीदा श्रेणी का ही क्यों न हो।
Written by Kajal Panchal • Published on : 23 May 2026
IBN24 News Network : जस्टिस जगमोहन बंसल की एकल पीठ ने 8 नवंबर 2019 को जारी हरियाणा सरकार के उस ज्ञापन को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया, जिसमें पसंदीदा नंबर रखने के बदले अतिरिक्त फीस वसूलने की बात कही गई थी।
हरियाणा में पहले कई वाहनों के पंजीकरण नंबर पुरानी सीरीज में जारी किए गए थे, जो HR सीरीज का हिस्सा नहीं थे। बाद में राज्य सरकार ने सभी वाहनों को नई “HR” सीरीज में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू की।
सरकार ने 28 मई 2019 को एक आदेश जारी कर कहा था कि पुराने नंबरों को नई HR सीरीज में बिना किसी शुल्क के बदला जा सकता है। लेकिन इसके कुछ महीनों बाद 8 नवंबर 2019 को नया ज्ञापन जारी कर दिया गया, जिसमें कहा गया कि अगर वाहन मालिक अपनी पुरानी पसंदीदा या वीआईपी नंबर प्लेट को नई HR सीरीज में जारी रखना चाहते हैं तो उन्हें तय फीस जमा करनी होगी।
सरकार के इसी फैसले को कई वाहन मालिकों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकार वाहन नंबरों की सीरीज बदल सकती है, लेकिन इसके नाम पर अतिरिक्त शुल्क नहीं वसूल सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन वाहन मालिकों ने पहले ही पसंदीदा नंबर के लिए फीस जमा कर रखी है, उनसे दोबारा पैसा लेना कानून के खिलाफ है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत वाहन पंजीकरण से जुड़े नियम तय करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। राज्य सरकार केवल प्रशासनिक ज्ञापन जारी करके नए शुल्क लागू नहीं कर सकती।
वाहन मालिकों को क्या मिलेगा फायदा ?
सरकार ने कोर्ट में क्या दलील दी ?
हरियाणा सरकार ने अदालत में कहा था कि पुरानी नंबर सीरीज अब समाप्त हो चुकी हैं और सभी वाहन मालिकों को नई HR सीरीज में पंजीकरण करवाना जरूरी है। सरकार का तर्क था कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पसंद का नंबर दोबारा चाहता है तो उसे नई नीति के अनुसार शुल्क देना होगा।
हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जिसके आधार पर केवल ज्ञापन जारी कर अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सके।
अदालत की टिप्पणी बनी चर्चा का विषय
अदालत ने अपने आदेश में साफ कहा कि राज्य सरकार के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं था कि वह सिर्फ प्रशासनिक आदेश के जरिए लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाले। कोर्ट ने 2019 के विवादित ज्ञापन को “कानून की नजर में असंगत” बताते हुए रद्द कर दिया।
इस फैसले को हरियाणा के वाहन मालिकों के लिए बड़ी राहत और प्रशासनिक पारदर्शिता की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
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