शर्मनाक: घायल कबूतर को बचाने में गई बच्ची की इज्जत…जानिए पूरा मामला

नई दिल्ली। बाल पीड़िता के साथ दुर्व्यवहार से जुड़ा अपराध माफी के योग्य नहीं है। दोषी की सजा को कम करने और उसे रिहा करने से समाज में गलत संदेश जाएगा और बच्चों के खिलाफ अपराध को रोकने के जिन उद्देश्यों के लिए पाक्सो अधिनियम अधिनियमित किया गया है वह पूरा नहीं हो सकेगा।

न्यायमूर्ति एस प्रसाद की पीठ ने उक्त टिप्पणी करते हुए सात साल की बच्ची के साथ असहमति से बनाए गए यौन संबंध के मामले में दोषी जितेंद्र कुमार गोस्वामी की अपील याचिका खारिज कर दी।

पीठ ने जितेंद्र को दोषी करार देने के तीस हजारी अदालत के 29 नवंबर 2017 के फैसले को बरकरार रखते हुए प्रथम अपीलकर्ता अदालत की टिप्पणी को सही ठहराया, जिसमें अदालत ने बच्ची के साथ किए गए अपराध के मामले में दोषी को दी गई दो साल व छह महीने की सजा को कम बताया था।

न्यायमूर्ति एस प्रसाद की पीठ ने कहा कि दोनों ही अदालतों ने सभी तथ्यों एवं साक्ष्यों को देखने के बाद उचित फैसला सुनाया है।

सजा माफी की लगाई थी गुहार

निश्चित तौर पर मामले से जुड़ी फारेंसिंक रिपोर्ट आने में पांच साल का वक्त लगा है, लेकिन रिपोर्ट से यह साबित नहीं होता कि याचिकाकर्ता दोषी नहीं है। अतिरिक्त लोक अभियोजक मीनाक्षी चौहान ने कहा कि दोनों ही निचली अदालतों ने पीड़ित बच्ची के बयान को सही माना है और उसके बयान पर भरोसा किया है।

वहीं, दोषी के अधिवक्ता ने दलील दी कि उनका मुवक्किल पेशे से शिक्षक है और उसका परिवार है। निचली अदालत द्वारा दी गई 30 महीने की सजा में से 28 महीने की सजा उसने पूरी कर ली है। ऐसे में उसे राहत देते हुए उसकी बाकी की सजा को माफ कर दिया जाए।

यह है मामला

याचिका के अनुसार जून 2012 में बच्ची जब छत पर खेल रही थी तो उसे एक घायल कबूतर मिला। बच्ची कबूतर को लेकर अपने एक दोस्त के पास गई और उससे पूछा कि क्या वह कबूतर को रख सकता है। इस पर उसके दोस्त ने मना किया और कहा वह जानता है कि कबूतरों को कौन रखता है। उसने दोषी जितेंद्र कुमार गोस्वामी के बारे में बच्ची को बताया। बच्ची जब कबूतर देने जितेंद्र के घर पहुंची तो उसने उसके साथ मारपीट की और उसे जान से मारने की धमकी देकर गलत काम किया।

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