नोटबंदी के 4 साल बाद इस मंदिर से निकले 51 करोड़ के पुराने नोट

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तारीख 9 नवम्बर 2016. संबोधन था, “मित्रों…”

हमें नहीं लगता कि इसके आगे कुछ याद दिलाने की ज़रूरत है. क्योंकि यही वो दिन था, यही वो शब्द था जब शुरूआत हुई नोटबंदी की. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता के नाम संबोधन क्या दिया, लोगों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई. एक ही झटके में जेब में रखे सारे नोट कागज़ बन गए. अगले दिन बावरी होकर जनता बैंकों के आगे बेबस खड़ी नज़र आई.

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हालांकि कुछ ही वक्त में हालात बदल गए. लोगों के हाथों में नए नोट आ गए. आज भी जब कभी किसी किताब में दबा पुराना 500 या 1000 का नोट दिखाई देता है, तो वो कागज की रद्दी ही लगती है. पर हाल फिलहाल में देश के सबसे अमीर मंदिर तिरुपति बालाजी में इस रद्दी का ढेर निकलकर सामने आया है. एक दो नोट नहीं बल्कि पूरे 51 करोड़ के पुराने नोट सामने आए हैं.

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अब प्रबंधन के सामने सवाल ये है कि इसे रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जाए या फिर इनके बदलने का कोई रास्ता निकाला जाए!

कहां से आई इतनी रकम?

तिरूपति बालाजी मंदिर कोरोना काल में आर्थिक संकट से जूझ रहा है. मंदिर ट्रस्ट अप्रैल मई के दौरान अपने यहां से करीब 200 कर्मचारियों की छंटनी तक कर चुका है. लॉकडाउन के दौरान मंदिर बंद होने से ज्यादा दान नहीं मिला और मंदिर की माली हालात खराब होने लगी. जब मंदिर के सारे खजाने खाली होते गए तब पुजारियों का ध्यान मंदिर के बाहरी हिस्से में रखे दानपात्र पर गया. जिसे कई सालों से खोला ही नहीं गया, क्योंकि इसे मंदिर परिसर के बाहर रखा गया था.

ऐसा कहना तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट के चेयरमेन वाईवी सुब्बा रेड्डी का. रेड्डी कहते हैं कि इस पात्र को हुंडी कहा जाता है. हुंडी को हाल ही में खोला गया, तो उसमें भक्तों का अर्पित दान मिला. इसमें 500 और 1000 के नोट हैं. यह कुल राशि 51 करोड़ रुपए है. दिक्कत ये है कि सारे नोट नोटबंदी से पहले के हैं. चूंकि अब नोट बदलवाने की तारीख निकल चुकी है इसलिए इनका कोई मोल नहीं है.

अगर सरकार इन नोटों को बदल दे, तो मंदिर के पुजारियों और बाकी कर्मचारियों की बकाया सैलरी का इंतज़ाम हो जाएगा. इसके अलावा मंदिर के बाकी अधूरे काम भी पूरे हो सकते हैं. सुब्बा रेड्डी ने इस बारे में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से भी बात की है. हालांकि अभी तक सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया है पर मंदिर प्रबंधन को सरकार से काफ़ी उम्मीद है.

प्रबंधन की देरी या भक्तों की?

अब सवाल ये है कि आखिर मंदिर प्रबंधकों ने सारे दानपात्र खोले फिर एक दान पात्र बकाया कैसे रह गया? तो सुब्बा रेड्डी का जवाब है कि इस दानपात्र को करीब 4 साल से नहीं खोला गया है. वैसे तो मंदिर में आने वाली रोजाना की दानराशि का हिसाब किया जाता है पर यही एक दानपात्र था जिसे हाथ नहीं लगाया.

वैसे तो यह बात किसी के गले नहीं उतर रही है पर फिर भी अगर प्रबंधकों की बात मान भी ली जाए तो फिर एक दान पात्र में केवल पुराने नोट ही कैसे आए? रेड्डी ने इस तर्क का भी जवाब दिया है. उनका कहना है कि यह दानपात्र नोटबंदी के कुछ समय पहले ही स्थापित किया गया था. जब नोटबंदी हुई तो लोगों ने भर-भर कर पुराने नोट यहां दान किए. पुराने नोट कई और दानपात्रों में भी मिले थे. जिसे हमने तत्काल बदलवा लिया था पर इस राशि पर ध्यान नहीं गया.

उनका कहना है कि लोगों ने काफी समय बाद तक भी पुराने नोट यहां दान किए हैं. इसलिए हमारे पास पुराने नोटों का ढेर जमा है. उन्ही में से ये भी एक रकम है. अब प्रबंधन चाहता है कि भक्तों ने यह दान श्रद्धापूर्वक किया है इसलिए उनकी भावनाओं का सम्मान किया जाए और सरकार इन्हें बदलकर नए नोट मंदिर को दे दे.

क्या हो सकता है रास्ता?

वित्त मंत्री सीतारामण ने मंदिर प्रबंधकों को आश्वासन दिया है. कहा है कि इस बात को केन्द्रीय बैंकों के सामने रखा जाएगा और फिर निर्णय होगा. हालांकि नियम की मानें तो अब इन रुपयों की कोई कीमत नहीं है पर सरकार या बैंक प्रबंधन चाहे तो मंदिर के लिए नियमों को बदल सकती है.  पर विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर ऐसा होता है तो बहुत से और लोग भी सामने आएंगे जो चाहेंगे कि उनके पुराने नोट बदले जाएं. क्योंकि नोटबंदी के बाद भी कई लोग ऐसे थे, जिनकी बहुत सी राशि समय पर नहीं बदली गई और बाद में वह रद्दी बनकर रह गई.

31 दिसंबर 2016 के बाद देश में नई करंसी आ गई थी. ऐसे में तिरुपति मंदिर के 51 करोड़ रुपयों का भविष्य अब क्या होगा ये तो केन्द्रीय बैंकों के निर्णय पर निर्भर करता है. पर एक बात तो सच है कि अगर किसी करिश्में के साथ ये रद्दी अचानक नोटों में बदल जाए यानि बैंक मंदिर को 51 करोड़ रुपए दे दे तो मंदिर की माली हालत कुछ दिनों के लिए सुधर सकती है.

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