एक केस ने यूं बदल दी हरियाणा के इस गांव की तस्वीर, पहले लगता था अनपढ़ता का तंज

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पानीपत । वर्ष 2018 में गर्मियों के दिन थे। सिंहपुर-सिठाना गांव से सटी आइओसीएल की रिफाइनरी की पाइप लाइन लीक हो गई। देखते ही देखते कुछ दिनों में ग्रीन बेल्ट में लहलहाते पेड़ सफेद हो गए। पाइप लाइन से ठीक पहले लगे पेड़ तो हरे थे, जहां से लाइन लीक हुई, उसके आगे पेड़ सूखते गए। गांव के लोग वहां से गुजरते। जगह थोड़ी नीची थी। पहले कुछ समझ नहीं सके। धीरे-धीरे पता चला कि जरूर लीक हुए पाइप लाइन के केमिकल से जमीन खराब हो रही है। रिफाइनरी प्रबंधन तक बात पहुंचाई गई। 15 मिलियन मीट्रिक टन हर वर्ष तेल शोधन की क्षमता वाली रिफाइनरी में पर्यावरण के स्तर पर कोई चूक नहीं हो सकती, इस अतिआत्मविश्वास के कारण ग्रामीणों की बात पर ध्यान नहीं दिया।

बात यहीं तक सीमित नहीं थी। गांव का पानी पीने योग्य नहीं था। रिफाइनरी से निकल रहा पानी जिस जगह छोड़ा जाता है, वहां भी ऐसे हालात थे कि केमिकलयुक्त पानी जमीन में ही जा रहा था। समाधान का कोई रास्ता नहीं निकला तो नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल तक ग्रामीणों ने केस कर दिया। रिफाइनरी में पहुंच रखने वाले ठेकेदार कहते, तुम अनपढ़ हो। क्या कर लोगे। रिफाइनरी सारे नियम पालन करती है, पर उन्हें नहीं मालूम था, गांव के यही लोग पूरे तंत्र को न केवल सुधार करने के लिए मजबूर कर देंगे, बल्कि गांव में विकास के द्वार भी खुलवा देंगे।

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अब हालात ये हो गए हैं कि एनजीटी ने 659.49 करोड़ रुपये का रिफाइनरी पर हर्जाना ठोक दिया है। इसमें से 17 करोड़ रुपये भरवाए जा चुके हैं। हर्जाने की समीक्षा के लिए गठित दूसरी कमेटी ने भी 18 लाख घटाते हुए बाकी हर्जाने की अनुशंसा कर दी है। कैसे गांव के सरपंच सतपाल बाजीगर दो और गांवों के सरपंचों और ग्रामीणों के साथ मिलकर बदलाव लाए, पढ़िए जागरण की ये विशेष रिपोर्ट।

स्कूल बदल गया, सड़कों से गड्ढे गायब

सिंहपुरा और सिठाना की एक ही पंचायत है। जनरल कैटेगरी के इस वार्ड में एससी युवा सतपाल बाजीगर ने सरपंच का चुनाव जीता। अपने हक के लिए रिफाइनरी को भी एनजीटी ले जाने के लिए वह नहीं हिचके। बीए पास सतपाल बताते हैं, केस से पहले जब वे रिफाइनरी प्रबंधन से गांव में विकास कराने की बात कहते थे, तब उन्हें आश्वासन मिलता या काम धीरे होते। केस होते ही जैसे बदलाव की नई हवा ही चल पड़ी। सबसे पहले तो स्कूल का रूप बदल गया। कंप्यूटर लैब बनवा दी गई, सोलर पैनल रखवाया। सबसे बड़ी जीत हुई भूजल बचाने की। पोलिशिंग पोंड में केमिकलयुक्त पानी आता है। अब नीचे पोलिथिन की मोटी परत बिछाई गई है।

हर बरस लगाते हैं 15 हजार पौधे, इस बार पचास हजार लगाने हैं

मानसून के सीजन में हर वर्ष रिफाइनरी और आसपास 15 हजार पौधे लगाए जाते हैं। इस बार पचास हजार पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया है। वजह साफ है, पर्यावरण के प्रति बढ़ी गंभीरता। पर्यावरण विंग से जब इस बारे में पूछा गया कि पौधे कौन से लगाएंगे, जवाब दिया उपयोगी पौधे ही रोपे जाएंगे। सफेदे जैसे पौधे लगाने का सवाल ही नहीं। रिफाइनरी के आसपास छह लाख पेड़ जीवित हैं।

हर्जाना इस तरह लगाया गया है

26.90 करोड़ में लगेंगे पौधे : केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार 5.74 लाख किलोग्राम आक्सीजन नष्ट हुई है। क्षतिपूर्ति के लिए 22 लाख पौधे लगाने होंगे। इस पर 26.90 करोड़ खर्च होंगे।

भूजल को 540 करोड़ का नुकसान : पानी के सैंपल लिए गए थे। नाइट्रेट की मात्रा ज्यादा मिली। भूजल की क्षतिपूर्ति के लिए 540 करोड़ खर्च होंगे। 24 घंटे नलकूप चलाकर पानी में सुधार करना होगा।

पांच वर्ष में इस तरह आसपास के गांवों में खर्ची राशि

2015-16 : 1.44 करोड़

2016-17 : 4.61 करोड़

2017-18 : 7.46 करोड़

2018-19 : 5.31 करोड़

2019-20 : 7.14 करोड़

रिफाइनरी के साथ ही तीन पंचायतें लगती हैं। ददलाना, बोहली और सिठाना। सिठाना के सरपंच सतपाल ने बताया कि रिफाइनरी के आसपास चार किलोमीटर तक हालात बदतर हो रहे थे। रिफाइनरी ने जो एनालिसिस यंत्र लगाए थे, वो खराब थे। रिपोर्ट गलत भेजी जा रही थी। उन्होंने एनजीटी में इस मामले को उठाया। इसके बाद ये हर्जाना लगा। अब रिफाइनरी प्रबंधन ने काफी सुधारात्मक काम किए हैं।

क्या उपाय किए गए

-पोलिशिंग पोंड यानी जिस जगह पर पानी बाहर निकलता है। यहां पर पूरी जगह को खाली किया, इसके बाद जमीन पर पोलिथिन की मोटी परत चढ़ाई। अब पानी जमीन के नीचे नहीं जाता।

-प्रदूषण चेक करने के लिए आठ मॉनीटरिंग स्टेशन बनाए गए हैं। इसके अलावा मोबाइल वैन है, जो अलग-अलग जगह मौजूद रहती है।

-हर वर्ष 15 हजार पौधे लगाए। इस बार पचास हजार पौधे लगाएंगे। इनमें गुलमोहर, अमलतास, नीम प्रमुख हैं।

-गांवों में सोलर पैनल लगवाए। सोलर स्ट्रीट लाइटें लगाई जा रही हैं। आसपास के गांवों में 59 सोलर पैनल लगवाए जा चुके। इस पर 2.88 करोड़ खर्चे।

-सिठाना के राजकीय स्कूल पर 35 लाख से अधिक खर्च किए। सौंदर्यीकरण के मामले में यह स्कूल ब्लॉक में प्रथम आया।

-सिठाना के स्टेडियम में सुधार किया। दर्शनों के बैठने के लिए दो शेड बनवाए जा चुके हैं। पूरे गांव में सड़कें बनवाईं।

-हर्जाने का पैसा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास, क्या करेंगे इसका

-रिफाइनरी ने 17 करोड़ 31 लाख रुपये प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को जमा करवाए हैं। इसके अलावा अपनी तरफ से गांवों में विकास कार्य करवाए हैं। सवाल ये है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने हर्जाने के इन रुपयों से अब तक क्यों कुछ नहीं किया। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों का कहना है कि एनजीटी के निर्देश अनुसार ही रुपये खर्च करेंगे।

गांव का नाम सिठाना क्यों

दरअसल, इस गांव में पहले व्यापारी रहते थे। सेठों के कारण गांव का नाम सिठाना पड़ गया। दुल्ला मुसलमान भी इस गांव में काफी मशहूर था। बंटवारे के बाद मुस्लमान गांव छोड़ गए। विभाजन के बाद कुछ लोग पाकिस्तान से आए तो कुछ परिवार पंजाब से आए। सरपंच सतपाल का परिवार पंजाब के खन्ना से यहां आकर बसा। खेतीबाड़ी इस गांव के आय का प्रमुख साधन है। 20 एकड़ से ज्यादा जमीन पर पोली हाउस बने हुए हैं। गांव की महिलाओं को यहां पर काम मिल जाता है। इस समय शिमला मिर्च लगी हुई हैं।

सुनवाई 24 जुलाई को

एनजीटी में 24 को इस केस की सुनवाई है। दूसरी कमेटी ने भी भारीभरकम हर्जाने की सिफारिश की है। अगर एनजीटी ने इसे भी सही माना तो रिफाइनरी पर बड़ा हर्जाना लग सकता है।

पॉइंट वाइज समझिए, जांच में क्या मिला, अब क्या स्टेटस

1- थिराना ड्रेन में पानी नहीं जाना चाहिए

कमेटी की टिप्पणी : सिंचाई विभाग से अनुमति पत्र नहीं दिखा सकी आइओसीएल

जवाब : हम अनुमति ले चुके हैं। ड्रेन के संबंध में बकायदा औपचारिक रूप से उद्घाटन हुआ था।

2- गैसों का खुले में उत्सर्जन बंद होना चाहिए।

कमेटी की टिप्पणी : अब तक कुछ नहीं हुआ।

जवाब : ईटीपी की क्षमता को 1 और 2 को मई 2021 तक बढ़ाएंगे। पोलिशिंग पोंड, जहां पर केमिकलयुक्त पानी पहुंचता है, उसको कवर करने या किसी और समाधान के लिए प्रयास शुरू कर दिए हैं। इस काम को करने के लिए जो कंपनी रूचि रखती है, उसके लिए टेंडर काॅल किए गए थे। भारत पेट्रोलियम कंपनी सामने आई है। रिफाइनरी की ओर से जल्द बड़े कदम उठाए जाएंगे।

3- भूजल खराब हो रहा है। लोगों के जीवन पर असर पड़ा है।

कमेटी की टिप्पणी : अब तक कुछ प्रगति नहीं।

रिफाइनरी का जवाब : कोर्ट में बताएंगे।

4- जब तक भूजल की गुणवत्ता में सुधार नहीं होता, तब तक रिफाइनरी आसपास के गांवों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराए।

कमेटी की टिप्पणी : अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया।

रिफाइनरी का जवाब : हमने जनस्वास्थ्य विभाग से पाइप लाइन बिछाने और ट्यूबवेल के लिए एस्टीमेट मांगा था। अब तक वहां से फाइल नहीं आई। हम पैसा देने को तैयार हैं।

5- बड़ा रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने की जरूरत है, इससे भूजल स्तर ठीक होगा।

कमेटी की टिप्पणी : प्रगति नहीं हुई।

रिफाइनरी का जवाब : रेन वाटर हार्वेस्टिंग का सुझाव ठीक नहीं है, क्योंकि प्लांट में हाइड्रोकार्बन भी है। हालांकि नॉन प्लांट इमारतों में ये सिस्टम लगाए हैं, आगे भी लगाएंगे। चार लगा चुके हैं, बाकी 38 को अगले दो वर्ष में लगा देंगे।

6- ग्रीन बेल्ट का और विस्तार करना चाहिए

कमेटी की टिप्पणी : 15 हजार पौधे लगाए जा चुके हैं। आगे पचास हजार पौधे लगाने का प्रस्ताव है। इस मामले में प्रगति दिख रही है।

7-8-9 जहां भी पानी जमा किया जाता है, वहां इंतजाम बेहतर हों। पानी रिसाइकिल हो, ट्रीट किया जाए। दू

कमेटी की टिप्पणी : बारिश और तेलीय पदार्थों के मामले में व्यवस्था नहीं है। आइओसीएल ने आश्वासन दिया है कि 2022 तक इसे लाइनअप कर लेंगे। दूषित पानी और बरसाती पानी के लिए अलग से ड्रेन नहीं है। सब कुछ खुले में बह रहा है।

आइओसीएल का जवाब : जीरो लिक्वड डिस्चार्ज यानी पूरे पानी के इस्तेमाल, रीसाइिकल के लिए आठ कंपनियों ने प्रोजेक्ट दिखाया है। इनसे बजट मांगा गया है। 2023 तक जेडएलडी लगा देंगे।

नोट : फरवरी 2020 के जवाब, रिफाइनरी प्रबंधन से बातचीत के आधार पर। इससे इतर कुछ तथ्यों, मामलों, सुबूतों को एनजीटी के सामने रखा जाएगा।

जांच कमेटी के सुझावों पर काफी काम कराए जा रहे

सीएसआर और जनसंपर्क विंग महाप्रबंधक एसके त्रिपाठी का कहना है कि हमने आसपास के गांवों में काफी काम कराए हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए सभी नियमों काे माना जाता है। जहां तक सुधारात्मक कदमों की बात है, उसके बारे में एनजीटी को बताएंगे। पर्यावरण के लिए रिफाइनरी बड़े स्तर पर काम कर रही है। जांच कमेटी के सुझावों पर काफी काम कराए भी जा रहे हैं।

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