20 माह की मासूम ने बचाई 5 लोगों की जिंदगी, बनी यंगेस्ट कैडेवर डोनर, पढ़ें पूरी खबर

दिल्ली। बच्चे जब आते हो तो मानों खुशियां लेकर आते है। दरअसल आज हम आपको एक मासूम की बेटी की बारे में बताएंगे जिसने पांच लोगों की जिंदगी बचाई है। आप इस प्यारी सी बच्ची की मुस्कान देख रहे हैं आप। 20 महीने के इस बच्ची ने अपनी ये मुस्कान पांच अलग-अलग लोगों में बांट दी है। कहते हैं खुशियां बांटनी चाहिए…और बच्चे तो खुशियां बांटने के लिए आते हैं।

इस बच्ची ने दुनिया छोड़ने से पहले पांच लोगों की जिदंगी संवार दी। ये सबसे कम उम्र की कैडेवर डोनर भी बन गई है। इसने अपने शरीर के पांच अंगों को दान किया। भारत में पहले लोग इस तरह से अंगों को दान करने से हिचकते थे लेकिन अब पिछले कुछ सालों में अंगदान की परंपरा में तेजी आई है। लोग खुद आगे आकर अपने अंग दान करते हैं। इसके बावजूद लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के मुताबिक 13 मार्च 2020 तक भारत में अंगदान की प्रतिक्षा में कुल 30,886 मरीज हैं।

कैडेवर डोनर उसे कहते हैं जो शरीर के पांच जरूरी अंगों का दान करता है। ये अंग हैं- दिल, लिवर, दोनों किडनी और आंखों की कॉर्निया। कैडेवर डोनर होने के लिए जरूरी है कि मरीज ब्रेन डेड हो। इसके लिए परिजनों की अनुमति चाहिए होती है। आमतौर पर दानदाता और रिसीवर का नाम गोपनीय रखा जाता है लेकिन परिजन चाहे तो दानदाता का नाम उजागर कर सकता है।

बतादें कि दिल्ली के रोहिणी इलाके में 8 जनवरी को 20 महीने की धनिष्ठा खेलते समय अपने घर की पहली मंजिल से नीचे गिर गई थी। इसके बाद वह बेहोश हो गई. परिजन उसे तुरंत सर गंगाराम अस्पताल लेकर गए। डॉक्टरों ने उसे होश में लाने की बहुत कोशिश की लेकिन सब बेकार साबित हुआ। 11 जनवरी को धनिष्ठा को ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया। दिमाग के अलावा धनिष्ठा के सारे अंग सही से काम कर रहे थे। तब उसके परिजनों पिता अशीष कुमार और मां बबिता ने उसके अंग दान करने का फैसला किया।

धनिष्ठा का दिल, लिवर, दोनों किडनी और कॉर्निया सर गंगाराम अस्पताल ने निकाल कर पांच रोगियों में प्रत्यारोपित कर दिया। धनिष्ठा ने मरने के बाद भी पांच लोगों अपने अंग देकर उन्हें नया जीवन दे गई। अपने चेहरे की मुस्कान उन पांच लोगों के चेहरे पर छोड़कर चली गई। धनिष्ठा के पिता और माता ने अंगदान को लेकर अस्पताल के अधिकारियों से बात की थी। दुखी होने के बावजूद ये फैसला लेना बेहद कठिन है।

धनिष्ठा के पिता आशीष ने बताया कि हमने अस्पताल में रहते हुए कई ऐसे मरीज़ देखे जिन्हे अंगों की सख्त आवश्यकता थी। हांलाकि हम अपनी धनिष्ठा को खो चुके थे लेकिन हमने सोचा की अंगदान से उसके अंग न ही सिर्फ मरीज़ों में जिन्दा रहेंगे, बल्कि उनकी जान बचाने में भी मददगार साबित होंगे।

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